Ravindranath Tagore

रविंद्रनाथ टैगोर – 

रवीन्द्र नाथ टैगोर (1861 – 1941)

टैगोर मूलत: एक साहित्यकार थे वे राजनीतिक चिंतक नहीं थे, वे बुद्धिजीवी थे । वे विशिष्ट राजनीतिक परिस्थिति में रह रहे थे। जिसमें रूस की क्रांति, दो विश्वयुद्ध हुए आज जिसमें भारत एक राष्ट्रीय आंदोलन चला रहा था। इसलिए यह राजनीतिक परिस्थिति से प्रभावित हुए उनका
कोई सुव्यवस्थित भी राजनीतिक चिंतन नहीं है , उनके राजनीतिक विचार विभिन्न समस्याओं की प्रतिक्रियाओं के रूप में है, उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृति गीतांजलि है। जिसके लिए उन्हें 1913 में नोबेल पुरस्कार मिले उनके राजनीतिक विचार बहुत ही साधारण है; परंतु वह उनकी स्वतंत्र सोच के प्रतीक है। टैगोर कांग्रेस अधिवेशनो से संबंधित है; तथा कलकत्ता में कांग्रेस के अधिवेशनो में उन्होंने भाग लिया ये अधिवेशन तीन बार हुए 1886 , 1896 , 1906 इसके अतिरिक्त उन्होंने दो बार प्रांतीय समिति के अधिवेशनों को संबोधित किया – 
(1896 , 1908) ,
कांग्रेस में उन्होंने कभी भी उदारवादियों का साथ नहीं दिया वे उनके साधनों को भिक्षावृत्ति मानते थे, वे उग्रवादियों के प्रति संवेदनशील वास्तव में वह कांग्रेस के विरुद्ध नेताओं से पूर्णत: असंतुष्ट थे क्योंकि उनका कहना था कि इनकी विचारधारा तथा नेतृत्व में परिवर्तन होना चाहिए। यह परिवर्तन केवल युवा सदस्य ही कर सकते हैं राजनीतिक दृष्टि से उनके विचार स्वतंत्रा के संबंध में तथा राष्ट्रवाद के संबंध में महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता का अर्थ  मात्र राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है क्योंकि भारत एक अत्यंत ही विभाजित समाज है उनका कहना था कि भारत के सामने दो संकट हैं :-
(1) सामाजिक पिछड़ापन, अल्पदृष्टि इसके अतिरिक्त साथ ही साथ यहाँ धार्मिक तथा जातीय विभाजन भी पाया जाता है। 
(2) विदेशी साहस – उनका मानना था कि भारत के साधारण लोग आत्मसम्मान तथा आत्मगौरव या मनुष्य की गरिमा के बारे में नहीं जानते थे ऐसे लोगों के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है, राजनीतिक स्वतंत्रता की बात करना उन को बेवकूफ बनाने जैसा है लोगों की मानसिकता बदलनी है, इन लोगों में चापलूसी की मानसिकता है जिन्हें हमें परिवर्तन करना है तब हमें इन्हें स्वतंत्रा संघर्ष में शामिल करना है। यह काम भारत के नौजवान कर सकते हैं; क्योंकि वे प्रकृति के विद्रोही होते हैं। और वे भारत में एक नई सोच ला सकते हैं, इस संबंध में युवाओं की क्रांतिकारी गतिविधियों के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने क्रांतिकारियो के त्याग व बलिदान की आलोचना कभी नहीं की परंतु उनका मानना था कि मैं समाज को लाने के लिए एक उचित साधन नहीं है क्योंकि वह किसी भी प्रकार की हिंसा के समर्थक नहीं थे। 
उनका कहना था कि हिंसा के बिना एक राष्ट्रीय पूर्वजागरण हो सकता है , यहां केवल युवा नेताओं द्वारा ही हो सकता है।

राष्ट्रवाद संबंधित विचार – 

उन्होंने एक लेख लिखा जिसका शीर्षक है 
“Nationalism West” था इसमें पक्षी में राष्ट्रवाद की आलोचना की उनका मानना था पश्चिमी राष्ट्रवाद बहुत आक्रमणकारी है। जो राष्ट्र के सर्वश्रेष्ठ होने की भावना को मानता है जो केवल तनाव को जन्म देता है पश्चिम में राष्ट्रीय लोगों का राजनीतिक व आर्थिक संगठन है परंतु इसमें लोग बडे यांत्रिक तरीके से गठित हुए हैं । इस राष्ट्र का उद्देश्य केवल अपनी शक्ति को बढ़ाना है, शक्ति बढ़ाने का अर्थ है, कि केवल राज्यसभा की शक्ति बढ़ रही है जनता की नहीं इस संबंध में कहते हैं कि पारम्परिक राज्य व आधुनिक राज्य में अंतर है। प्रारंभ में राज्य के लिए समाज को बनाए रखना परंतु वर्तमान काल में राज्य निरन्तर व्यक्ति के जीवन में हस्तक्षेप है यह हस्तक्षेप स्वार्थों को पूरा करने के लिए किया जाता था। उनका मानना था कि उपभोक्तावाद से समाज के धनवान लोगों को ही लाभ होगा वह शक्तिशाली वा संपन्न होंगे इसी प्रकार राज्य साहस बाल भी शक्तिशाली होता चला जा रहा था इस प्रकार उनका कहना था कि पश्चिमी राज्य संपन्न वर्गों का साथ दे रहा है और इसलिए यह गरीब देशों का शोषण कर रहा है, दूसरे शब्दों में कहा कि समाजवादी और पूंजीवाद में गहरा संबंध है। पूंजीपतियों के आर्थिक हितों की रक्षा के लिए समाजवाद की स्थापना की गई क्योंकि एक श्रेष्ठ अपने देश के व्यापारियों की रक्षा करता है आपने पूंजी पतियों की पूंजी की रक्षा करता है,
रविंद्र नाथ टैगोर का कहना था कि राष्ट्रीय ही राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा पाप है क्योंकि उनका मानना था कि एक राष्ट्र जो शक्तिशाली हो जाता है तो वह नहीं चाहता है कि अविकसित देश भी राष्ट्र बन जाए क्योंकि जैसे ही वह राष्ट्र बन जाएगा वहां उसका प्रतियोगी बन जाएगा इसलिए अंग्रेजी अखबारों में जापान की बहुत आलोचना की उनका मानना था कि जापान जब राष्ट्रीय एक होगा तो वह भी आक्रमणकारी होगा टैगोर ने जापान के युवकों को चेतावनी दी उन्हें पश्चिमी राष्ट्रवाद नहीं अपनाना चाहिए उनका मानना था की पश्चिमी टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर अपना औधोगिक विकास कराना चाहिए परंतु उन्हें कभी भी  पश्चिमी राष्ट्रवाद से प्रेरणा नहीं लेनी चाहिए, अन्यथा वो भी आक्रमणकारी हो जाएंगे, उनका कहना था कि भारत पराजित के आधार पर इतना विकसित है कि वहां राष्ट्रवाद से एकता स्थापित नहीं हो सकती है उनका कहना था कि लोगों को स्वतंत्रता संघर्ष में शामिल करने से उनमे एकता नहीं होगी स्वतंत्रता आंदोलन एक जादू की छड़ी नहीं है जो हमारे आपसी विवाद को दूर कर देगा इसके लिए समाज को पुननिर्मित करना पड़ेगा इसका उल्लेख उन्होंने लेख
स्वदेशी समाज मैं किया उनका कहना था कि प्राचीन काल में राज व समाज में अंतर है :-
(1) समाज की रक्षा करना है 
(2) कानून लागू करना है 
(3) न्याय का प्रशासन करना है
समाज की समस्या का हल समाजिक संख्याओं में ही मिलता है विदेशी शासन से यह व्यवस्था समाप्त हो गई क्योंकि विदेशी सत्ता निरंतर समाज में हस्तक्षेप कर रही है , और निरंतर समाज में निर्णय लेने का प्रयास किया जा रहा है टैगोर का मानना है कि विदेशी सत्ता को समाज कल्याण के लिए कार्य नहीं करना चाहिए इससे समाज राज्य पर निर्भर हो जाएगा और जनता उदास होगी अपने आप कोई प्रयास नहीं करेंगें वे कहते थे कि समाज में अपनी समस्या का समाधान तभी होगा जब उनकी कुछ परंपराएं होंगी सामुदायिक त्योहारों का प्रोत्साहन दिया जाए इसके अतिरिक्त उनका कहना था कि प्रत्येक समुदाय में एक स्थानीय नेता होने चाहिए और यह समाज में दो होने चाहिए :-
(1) हिंदू 
(2) मुसलमान
इससे समाज में सौहार्दता होगी राजसत्ता के साथ-साथ एक सामाजिक तथा विकसित होगी जिससे चार स्तंम्भ होंगे :-
(1) ग्रामीण 
(2) प्रांतीय 
(3) जिला 
(4) केंद्रित स्तर
इस प्रकार राज्य के अंदर राज्य उत्पन्न हो जाएगा और सामाजिक स्वायतता (Social Freedom) स्थापित होगी

टैगोर के गांधी के प्रति विचार –

गांधी टैगोर में गहरा संबंध था क्योंकि गांधी जी को महात्मा की उपाधि से इन्होंने उपाधि से संबोधित किया इसके बावजूद दोनों नेताओं में मतभेद था टैगोर ने गांधी के चरखा आंदोलन का विरोध किया क्योंकि वे मानते थे कि इस आंदोलन से गरीबी की समाप्ति नहीं होगी नए समाज की रचना होगी वे इसे प्रतीकात्मक तथा अल्पकालिक है उनका कहना था कि इसे राजनीतिक स्थिति आज शायद नहीं मिल सकता है परंतु समाज का पुर्ननिर्माण नहीं हो सकता 1921 में लेख लिखा Satyen Ahwan जिसमें उन्होंने गांधी के द्वारा विदेशी कपड़ों की आलोचना की उनका कहना था कि इससे केवल भारत के धनवान लोगों को फायदा हो रहा है।
टैगोर का मानना था कि यह एक व्यर्थ आंदोलन है और लोगों से विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करने सूत काटने से नया समाज नहीं बन सकता है, गांधी  जी को इसके विपरीत विश्व स्तर पर भारत का नैतिक सर्वष्ठता को स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए ,वे गांधी के द्वारा वर्णाश्रम व्यवस्था का टैगोर ने असमर्थ किया गांधी का मानना था कि यह कार्य विभाजन है, हर समाज अपने में कार्य विभाजन करता है। टैगोर का मानना था कि इससे जातीय वर्गीकरण होता है, और उच्च समाज से निम्न का बहिष्करण होता है इसलिए यह आदर्श व्यवस्था नहीं है। उन्होंने गांधी के असहयोग आंदोलन का विरोधी किया उनका कहना था कि यह एक नकारात्मक खोज है।।

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