Raja Ram Mohan Roy

 राममोहन राय – 

आधुनिक भारत के इतिहास का अत्यधिक अंधकारमय युग पुराना समाज और राजतंत्र तहस नहस हो चुका था, उसके अवशेष चारों ओर बिखरे पड़े थे। कोई ताकत नहीं थी जो इन विकृतियों को खत्म कर दे। पुरानी बुनियाद पर नई स्थापना का प्रयत्न भी नहीं हो रहा था। मरी हुई परम्पराएं, जड़ हो चुके रिवाज और मूर्खतापूर्ण कट्टरता देश की जीवन शक्ति सोख चुके थे। निर्मम अंधकार चारों ओर बिखरा हुआ था। व्यर्थता और शुष्कता के इसी वातावरण में राममोहन राय का पर्दापण हुआ। 
आधुनिक भारत के जनक राममोहन राय को ‘राजा’ की उपाधि अकबर द्वितीय ने दिया। 
राममोहन राय का जन्म 22 मई सन् 1772 में बंगाल में दारकेश्वर नदी के तट पर स्थित राधा नगर गांव में हुआ था। राजा पहले व्यक्ति थे  जिन्होंने भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता का संदेश दिया। राय को अपने देश से प्रेम था, वे धर्मशास्त्रों के गम्भीर विव्दान और शक्तिशाली समाज सुधारक थे, किन्तु वे शहीद नहीं थे। वे पश्चिमी विचारधारा से बहुत प्रभावित थे। ब्रिटिश शासन को ईश्वरीय वरदान मनाते थे। राय के विचारों पर माण्टेस्क्यू, ब्लैकस्टन तथा बेंथम का काफी प्रभाव देखने को मिलता है। वे बेंथम की ‘फ्रेगमेण्ट आन गर्वमेण्ट’ व ‘इंण्ट्रोडक्शन टू माॅरल्स एड लेजीलेशन’ रचनाओं से बहुत प्रभावित थे। 
बेंथम राजा राममोहन राय को मानवता की सेवा में अपना हमराह मानते थे। राय के बारे में मैक्समूलर कहते हैं कि ‘वह मनुष्यों के बीच एक राजा के समान थे क्योंकि उनकी सोच महान थी।’ 
सोफिया फाॅलेट का कहना है कि ‘उन्हें भारतीय इतिहास में एक ऐसे सजीव पुल के रूप में देखा है जिसके ऊपर होकर भारत अपने असीम अतीत से निकलकर अज्ञात भविष्य की ओर अग्रसर होता है।’ 
राजा राममोहन राय का लेखन कार्य-   निम्नलिखित कृतियों से हमें उनके राजनीतिक विचारों का पता चलता है।
1. हिंदू उत्तराधिकारी कानून के अनुसार स्त्रियों के प्राचीन अधिकारों पर कतिपय आधुनिक अतिक्रमण सम्बन्धी संक्षिप्त टिप्पणीयां (1822)
2. प्रेस नियमन के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय एवं सम्राट की याचिका (1823)
3. अंग्रेजी शिक्षा पर लार्ड एम्हस्टर के नाम पत्र (1823)
4.इसाई जनता के नाम अन्तिम अपील (1823)
5.यूरोपवासियों को भारत में बसाने सम्बन्धी विचार (1823)
6. प्राचीन एवं आधुनिक सीमाओं का संक्षिप्त विवरण तथा भारत का इतिहास (1832)
7. भारत की न्यायिक एवं राजस्व व्यवस्था आदि पर प्रश्नोत्तर (1832)
8. तुहफत-उल-मुवाहिदीन
9. पत्र एवं भाषण आदि। 

राय के दो विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है – 

1. सार्वभौमिकता (Universalism) 
2. तर्कवाद   (Rationalism) 

1.सार्वभौमिकतावाद –  

उनके ये विचार तीन क्षेत्रों में देखने को मिलते हैं – a. भाषा (Language) 
b. धर्म (Religion) 
c.  दृष्टिकोण (Outlook) 
 a. भाषा के विषय में कहा जा सकता है कि वे बहुभाषी थे। इन्हें 10 भाषाओं का ज्ञान था। इनका जन्म रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में हुआ। 1780 में इन्हें अरबी, फारसी अध्ययन के लिए पटना भेजा गया। यहीं पर इन्होंने अरबी में कुरान पढ़ा। इन्होंने अपनी पहली पुस्तक 1805 ई में फारसी भाषा में ‘तुहक्फत – उल-मुवाहद्दीन’ लिखीं। बंगाली इनकी मातृभाषा थी और संस्कृत बचपन की भाषा थी। पटना के बाद ये बनारस गये जहाँ संस्कृत का अध्ययन किया, और संस्कृत के धर्म ग्रंथों विशेषकर उपनिषदों का अध्ययन किया। 1805 में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा की और धीरे – धीरे अन्य भाषाओं का ज्ञान अर्जित किया। जैसे – पाती, यूनानी, हीब्र, यहूदी, अंग्रेजी इत्यादि। इसलिए उनके विचार एक भाषा की पुस्तक तक सीमित नहीं थे। इसके अतिरिक्त उनकी विशेष रूचि धर्म व धार्मिक ग्रंथों में थी। उन्होंने हिन्दू धर्म ग्रंथों के अतिरिक्त कुरान, बाइबिल, बौद्ध व जैन धर्म की पुस्तकों का अध्ययन किया। वे इन धर्म ग्रंथों को इनके मूल रूप में पढ़ना चाहते थे इसलिए इतनी भाषायें सीखीं। इतना ही नहीं इन्होंने कुरान को बंगाली, उपनिषदों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। 
b. महान मानवतावादी राजा राममोहन राय सहयोग, सहिष्णुता, साहचर्य में विश्वास करते थे। वे चाहते थे कि परम्परागत बन्धन जिन्होंने मनुष्य के मन और आत्मा को बन्दी बना रखा था, खोल दिये जायें और मनुष्य को सहिष्णुता, सहानुभूति तथा बुद्धि पर आधारित समाज का निर्माण करने के लिए छोड़ दिया जाए। उनका मानना था कि विश्व के सभी धर्मों में 3 प्रमुख समानता है – 
1. हर धर्म ईश्वर में विश्वास करता है। 
2. हर धर्म आत्मा को मानता है। 
3. हर धर्म मृत्यु के पश्चात एक जीवन की बात करता है। 
इनके इन्हीं विचारों ने विवेकानंद को प्रभावित किया और विवेकानंद ने घोषित किया कि ‘सभी  धर्म परमात्मा तक पहुंचने के विभिन्न मार्ग हैं।’ यही विचार गांधी व रवीन्द्रनाथ टैगोर को प्रभावित किया। न्यू टेस्टमिंट की उदात्त शिक्षा कुरान की तौहीद की धारणा के प्रभाव के कारण ही बहुदेववाद का विरोध किया और एक ईश्वरवाद का समर्थन किया।
वे कहते हैं कि विश्व में एक सर्वशक्तिमान सत्ता है जो एक उदार तथा मंगलकारी । विश्व के सभी धर्म एक ईश्वरवाद में विश्वास करते हैं। जैसे- इस्लाम, इसाई धर्म। इन्होंने कहा हमार उपनिषदों में भी एक ईश्वर की बात कही गयी है। ये समानता अन्य धर्मों में भी दिखायी देती हैं। 
                                                         ब्रह्म समाज का
इतिहास लिखते हुये एक व्यक्ति ने बताया कि इसकी जो पूजा करने की विधि सर्वधर्म समान थी । वहाँ एक व्यक्ति वेदों से श्लोक पढ़ते थे, उपनिषद ग्रन्थ को पढ़ते थे। कई इसाई अपने Hinduism गीत थे । इस्लाम धर्म के लोग संगत करते थे । इस प्रकार यह सर्वधर्म का समन्वय था ।
C. राम मोहन राय के अपने दृष्टिकोण में भी एक सार्वभौमिकता थी। इसकी सबसे अच्छी व्याख्या टैगोर ने किया । उनकी मृत्यु शताब्दी पर एक 1933 में बंगाली में लेख लिखा जिसका शीर्षक’_____’ था। राम मोहन राय की सबसे बड़ी विशेषता यह भी कि उन्होंने पश्चिम का सन्देश अपनाया लेकिन भारत को हीन नही दिखाया। 
उन्होंने मनुष्य के अधिकारों की बात की 1 सत्य या सच्चाई सभी मनुष्यों के प्राप्त है और भारतीय केवल भारत के निवासी नहीं हैं सम्पूर्ण विश्व के हैं। राय ने पूरब व पश्चिम को मिलाने का प्रयास किया। उनकी रुचि केवल भारतीय महिलाओं की स्थिति में सुधार करने में नहीं अपितु पुरे विश्व की थी। 
1803 में वे इंग्लैंण्ड गये वहाँ अनेक विषयों मानव एकता, भारत व पश्चिम के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान पर चर्चा की। उन्होंने यूरोप के स्वतंत्रता आन्दोलन विशेषकर इटली की
स्वतंत्रता का समर्थन किया । 1820 में इटली के नेपल्स में एक क्रान्ति हुयी जिसमें राजतंत्र को हटाकर संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हुयी। 
राय को फ्रांस की क्रान्ति के स्वतंत्रता, समानता तथा भ्रातृत्व के आदर्शों का चिन्तन करके भारी उल्लास होता था । जब वह यूरोप जा रहे थे तो फ्रांसीसी स्टीमर को देखकर कहा कि “यदि मैं स्वतन्त्र फ्रांसीसी राष्ट्र के जहाज से इंग्लैंण्ड जा सकता तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है।” 
इसी प्रकार 19वीं सदी के आरम्भ में इंग्लैंण्ड में एक आन्दोलन चला जिसके तहत लोगों ने मताधिकार की मांग की, जिससे 1832 में एक कानून पास हुआ जिसे Reform Act कहा गया। 

2. तर्कवाद- 

राम मोहन राम में तर्कवाद दो तरीके से 
दिखायी देता है।
(i) सकारात्मक 
(ii) नकारात्मक
मूलतः राय मानते थे कि हर मनुष्य एक तार्किक प्राणी है क्योंकि हर मनुष्य में विवेक या बुद्ध होती है। हर व्यक्ति सही गलत के बीच को choose कर सकता है। अपना पथ निर्धारित कर सकता है। इसलिए किसी पंडित या पुरोहित को उसके मार्गदर्शन की कोई जरूरत नहीं, इस तरह एक ओर तर्कहीन विचारों का खण्डन किया। 
दूसरी ओर भारतीयों में विवेक बढ़ाने का प्रयास किया। तर्कहीन विचारों के सन्दर्भ में तुहफ्फत में कहा- वे हिन्दू धर्म में शुद्ध अशुद्ध की भावना खानपान से सम्बन्धित छुआछूत, बहुदेववाद धार्मिक कट्टरपन की आलोचना की । वे कहते हैं बहुदेववाद से जनता विभाजित हो जाती है। उसी प्रकार इनका कथन था – ‘धार्मिक ग्रन्थ को पढना किसी विशेष जाति काअधिकार नहीं है। इसीलिए उन्होंने धर्मग्रन्थों का अनुवाद किया, जिससे अधिक से अधिक व्यक्ति धर्मग्रन्थो को पढ़ सके ताकि उनमें विभिन्न विचार आये ।
इसके साथ – साथ उन्होंने विवेक को बढ़ाने के लिए सकारात्मक उपाय अपनाया । उनका मानना था कि “यदि भारत अंधविश्वास और अज्ञानता से ऊपर उठना है तो देश में वैज्ञानिक शिक्षा की शुरुआत आवश्यक है।” उन्होंने भारत में शिक्षा का विशेषकर पश्चिमी साहित्य व विज्ञान का प्रचार प्रसार किया ।
 राय का मानना था कि भारतीयों की जो परम्परागत शिक्षा व्यवस्था थी उसमें केवल तीन गुणों विकास होता था ।
पढ़ाई 
लिखाई
अंकगणित
 इसलिए उन्होंने पहली बार 1816 में कलकत्ता में एक विद्यालय खोला जो बाद में हिन्दू कॉलेज के नाम प्रसिद्ध हुआ । इसके अतिरिक्त 1825  में वेदांत काॅलेज, 1825 में महापाठशाला की स्थापना की । जिसमें परम्परागत शिक्षा के अतिरिक्त पश्चिमी विज्ञान एवं साहित्य पढ़ाया जाये ।
1823 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने प्रस्ताव रखा कि वह कलकला में एक सांस्कृतिक विद्यालय खोलें क्योंकि बनारस में एक ऐसा School खोला गया था । राय ने इसके विरोध में 11 दिसम्बर 1823 में गर्वनर जनरल लॉर्ड एम्हर्स्ट को पत्र लिखा कि संस्कृत की शिक्षा भारतीयों को अंधकार के गर्त में डाल देगी क्योंकि इससे भारतीय 2000 वर्ष पहले प्रचलित ज्ञान को ही सीख पायेगा। भारतीय नये युग के अनुसार तैयार नहीं होंगे। इसलिए उन्होंने मांग की सरकारी callege में पश्चिमी साहित्य व विज्ञान पढ़ाया जाये व शिक्षक यूरोप से मगाये जाय । राय का मानना था कि कालेज में प्रमागशाला खोला जाये, विज्ञान पढ़ने से भारतीयों में विवेक बढ़ेगा व इसके द्वारा भारत के अन्धविश्वासों का वे खंडन कर सकेंगे ।
 इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय परम्परागत शिक्षा का विरोध किया उन्होंने 1822 में कलकत्ता में ही एक वेद विद्यालय खोला जिसमें हिन्दू साहित्य, वेद, उपनिषद के साथ पश्चिमी विज्ञान भी पढ़ाया जाता था ।
                इसप्रकार उन्होंने बंगाली नवयुवकों को प्राचीन भारतीय दर्शन के साथ पश्चिमी विज्ञान से परिचित कराया। राय ऐसे व्यक्ति थे  जिन्होंने बंगाली भाषा को प्रोत्साहन दिया अनेक विद्यालय स्थापित किया, अपने विद्यालयों में बंगाली भाषा का माध्यम चना । इस प्रकार अंग्रेजी के साथ अपनी क्षेत्रीय भाषा को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया । इसलिए इन्हें ‘बंगाली गद्य का पिता’ भी कहा जाता है।

राम मोहन राय के राजनीतिक विचार –

                                        राय के राजनीतिक विचार तत्कालिक विचार है क्योंकि वे परिस्थिति के अनुसार व्यक्त किये गये हैं। राजनीतिक दृष्टि से उनके 3 विचार महत्वपूर्ण हैं ।
1. सुशासन बनाम स्वशासन सम्बन्धी विचार 
2. प्रेस की स्वतंत्रता सम्बन्धी विचार
3. शक्ति पृथक्करण का सिद्धान्त एवं न्यायिक सुधार सम्बन्धी विचार ।

1. सुशासन बनाम् स्वशासन- 

 राम मोहन राम का कहना था कि सुशासन स्वशासन से बेहतर होगा और उनका मानना था कि ब्रिटिश सरकार के अधीन ही भारत में सुशासन स्थापित हो सकता है। अपने लेख राममोहन रचनावली 1973 में प्रकाशित में राय ने स्वीकार के किया कि प्रारम्भ में वह ब्रिटिश सरकार के विरोधी थें वे उससे घृणा करते थे परन्तु 20 वर्ष की आयु बाद उनका सम्पर्क अनेक यूरोपवासियों के साथ हुआ। आसपास के देशों में भ्रमण किया। उसके बाद यह निश्चय किया कि सभी देशों की शासन प्रणाली से बेहतर ब्रिटिश शासन प्रणाली है। इसी से भारत का विकास हो सकता है। इसीलिए इन्होने ब्रिटिश शासन को एक ईश्वरीय वरदान माना । इस विचार के तीन मुख्य कारण हैं-
(¡) उनका मानना था कि भारत का पतन मुगलों व राजपूतों द्वारा स्थापित शासन के परिणामस्वरूप हुआ क्योंकि दोनों शासन निरकुंश व दमनकारी थे। इनकी तुलना में वह ब्रिटिश शासन को उदार मानते थे ।
(ii) ब्रिटिश शासन में भारत में पूंजीवाद की स्थापना की है। भारत का औद्योगीकरण किया है। ये भारत के विकास में सहायक था ।
(iii) ब्रिटेन में उदारवादी विचारधारा प्रबल थी और इसीलिए ब्रिटिश सांसद भी इसी विचारधारा से प्रभावित थे । इससे ब्रिटिश सांसद भारत के लिए जो कानून बनायेगी तो ये अच्छे उदारवादी कानून होगें। परन्तु उन्होंने ब्रिटिश संसद को असीमित कानून बनाने का अधिकार नहीं दिया था। उनका कहना था ब्रिटिश संसद भारत के लिये अच्छे कानून तभी बना सकती है, जब भारत में प्रेस की स्वतंत्रता हो। समय- समय पर ब्रिटिश सरकार जांच आयोग गठित करे जिसके द्वारा भारत में ब्रिटिश अधिकारी के कार्यों की जांच करे तथा
समय – समय लोगो से परामर्श ले ।
 कानून बनाने से पहले ब्रिटिश संसद को प्रबुद्ध भारतीयों से परामर्श करना चाहिए । इससे वे भारत के लिये अच्छा कानून बना सकते हैं। 
उनकी राय में इंग्लैंड के लिए भारत में अपना सांस्कृतिक तथा मानवतावादी कार्य पूरा करने हेतु 40 वर्ष का समय पर्याप्त है। इस अवधि में अंग्रेजी शासन भारतीय मस्तिष्क का आधुनिक विश्व संस्कृति से जीवित सम्पर्क स्थापित करने तथा देश में लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली की नींव डालने में सफल हो जायेगा जिससे भारत संसार के अन्य सभ्य देशों के स्तर तक पहुंच सके। 

2. प्रेस की स्वतंत्रता सम्बन्धी विचार-

 राय ने ये विचार अपने एक याचना पत्र में प्रस्तुत किया। ये याचना 1823 में कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गयी । (भारत में superme court की स्थापना 1874 में हुयी। ) ये याचना इसलिए प्रस्तुत की गयी क्योंकि उस समय के गवर्नर जनरल ने प्रेस पर नियंत्रण स्थापित किया था। जॉन एडम्स ने 1823 में एक अध्यादेश जारी किया कि दैनिक या साप्ताहिक किसी भी प्रकार के समाचार पत्र या पत्रिकाओं के प्रशासन के लिए सपरिषद् गर्वनर जनरल की पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है। एडम से पहले हेस्टिंग गर्वनर जनरल थे।
जिन्होंने 1819 में प्रेस पर नियंत्रण समाप्त किया। इसका लाभ उठाते हुए राय ने 3 साप्ताहिक पत्र प्रारम्भ किया ।
•1821 अंग्रेजी में ब्रह्मामनिकलू मैग्नीज बंगाली में संवाद कौमुदी,
•1822 फारसी में मिरात-उल-अखबार प्रारम्भ किया।
इसके बाद जब प्रेस पर नियंत्रण स्थापित हुआ तो उन्होंने याचिका प्रस्तुत की जिनमें निम्न बात स्पष्ट हुयी, विचार एवं अभिव्यक्ति के अधिकार के समर्थक थे। दूसरा उनका मानना था कि स्वतंत्र प्रेस इसलिए आवश्यक है क्योंकि इसके द्वारा भारतीय स्वतंत्र रूप से अपने विचार व आक्रोश को व्यक्त कर सकते हैं। प्रेस की स्वतंता सरकार के लिए सुरक्षा वाल्व होता है जिसके द्वारा लोग अपने असंतोष को व्यक्त करते हैं। इससे सरकार विरोध व क्रान्ति से बच जाते हैं।  इसके अतिरिक्त वो कहते हैं कि ब्रिटिश सरकार में भारतीयों को अपना विचार व्यक्त करने का कोई अवसर नहीं मिला। 
क्योंकि अंग्रेज भारतीयों को शासन में शामिल नहीं करते, जबकि मुगल शासन में भारतीयों को उच्च पदों सेना में उच्चाधिकारी व शासक के परामर्शदाता थे, इसलिए सरकार को उनके विचारों की जानकारी थी। इसीलिए भारत में स्वतंत्र प्रेस की आवश्यकता है। 

3. शक्ति प्रथक्करण एवं न्यायिक सुधार –                 

अपनी पुस्तक भारत में राजस्व और न्यायिक व्यवस्था में निर्भीकता से न्यायिक प्रशासन का मूल्यांकन किया । उस समय बंगाल में कार्नवालिस द्वारा न्यायिक व्यवस्था में राय को निम्नलिखित कमियां दिखायी दी । 
प्रथम उनका कहना था कि भारत में योग्य न्यायाधीशों की कमी थी और इसीलिए अन्य सेवाओं के लोग न्यायाधीश बना दिये जाते हैं। 
दूसरा उनका कहना था कि जिला स्तर पर कलेक्टर परिभ्रमण न्यायालय सर्किट न्यायालय का अधीक्षक होता था। राय ने इसका विरोध किया । उन्होंने कहा कलेक्टर तो प्रशासक होता है व कार्यपालिका का अंग होता है और उसका अंग होता है। किसी भी सभ्य समाज में कानून एक संस्था बनाती है व दूसरी संस्था क्रियान्वित करती है। इसके अतिरिक्त न्यायपालिका व कार्यपालिका भी अलग होते हैं। इसलिए वह शक्ति पृथक्करण के समर्थक थे ।
तीसरा उनके समय में न्यायालय में फारसी भाषा का प्रयोग किया जाता है जो साधारण लोगो की समझ से बाहर थी। उनका कहना था कि न्यायालय में ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए जिससे जज के साथ वादी प्रतिवादी भी समझ सके । उनका कहना था कि न्यायालयों में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग हो इससे अंग्रेजी का प्रचार – प्रसार होगा व इसे शिक्षित भारतीय समझ पायेगें तथा यह न्यायाधीश की मातृभाषा होगी ।
उनका कहना था कि फौजदारी मामलों में जूरी के द्वारा निर्णय दिया जाना चाहिए । इसके समर्थन में कहा कि भारतवासी जूरी का काम कर सकते हैं क्योंकि उन्हें प्रारम्भ से पंचायतों का अनुभव है । और पंचायतो में इसी प्रकार बहुमत से निर्णय लिए जाते थे। वे सेवानिवृत न्यायिक अधिकारियों तथा अपने काम से अवकाश ले लेने वाले वकीलों जूरियों का सदस्य चुना जा सकता है। राय के ये विचार 1833 में इंग्लैंड में व्यक्त किये गये थे, जब उन्हें काॅमन्स सभा के एक समिति के समक्ष गवाही देने के लिए बुलाया गया था । क्योंकि उस समय ब्रिटिश संसद 1833 एक्ट के सम्बन्ध में विचार कर रही थीं।  
न्यायिक सुधार में राय ने एक प्रस्ताव दिया कि भारत में कानून की एक संहिता (code) बनना चाहिए क्योंकि न्यायालयों से जो कानून लागू हो रहे हैं वे कई प्रकार थे-
कुछ पारम्परिक थें 
कुछ धार्मिक थे
कुछ शासक आदेश / स्थानीय नियम थे।
 उनका कहना था कि सबको संग्रह करके एक सूची बना लेनी चाहिए ।
यह 1837 में मैकाले के अधीनस्थ में Law Commission बना जिसमें देश में प्रचलित सारे कानूनों को एकत्रित किया । कानून की दो सहिता बनायी
(i) दीवानी कानून civil Law
(ii) फौजदारी कानून Criminal Law – 1860 में लागू हुआ कई अंश आज भी प्रभावी हैं। 
इस प्रकार राय की भारतीयों में पहले उदारवादी चिन्तक माने जाते हैं जिन्होंने व्यक्ति को एक विवेक प्रधान मनुष्य माना, कानून के शासन का समर्थन किया। 
विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात की। उन्होंने संगठनों के माध्यम से सरकार पर दबाव डालने का प्रयास किया । 1815 – आत्मीय सभा
          1828 – ब्रह्मो समाज
इसके अतिरिक्त उन्होंने एक राजनीतिक संगठन बनाया जिसे उन्होंने कोई नाम नहीं दिया। किंतु उनके मरने के  बाद में उनके समर्थको ने उदारवाद  का समर्थन  किया। 
व्यक्तिगत सम्पत्ति के अधिकार का समर्थन किया। उनका मानना था कि पुरुषों के साथ- साथ महिलाओं को भी सम्पत्ति में अधिकार दिया जाना चाहिए। 1822 के लेख में महिलाओं की सम्पति में अधिकार की चर्चा की।
और कहा कि पैतृक व पति के सम्पत्ति में पुत्रों के साथ – साथ पत्नी को बराबर का हिस्सा दिया जाना चाहिए। तथा एक चौथाई हिस्सा पुत्री को मिलना चाहिए।
राज्य के कल्याणकारी भूमिका की चर्चा की तथा अन्य भारतीयों की तरह अहस्तक्षेप का विरोध किया कहा कि सरकार को कानून के माध्यम से समाज सुधार करना चाहिए। इसके लिए निरन्तर दबाव डाला।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *