Human rights commission

राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग – 

मानवाधिकार आयोग विधेयक लोकसभा में 14 मई 1992 को प्रस्तुत किया गया था इसकी प्रावधानों के अंतर्गत राष्ट्रीय राज्य और वहां पर उच्च न्यायालय की स्थापना की गई। 27 सितंबर 1993 को अध्यादेश जारी कर दिया गया भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग बार अक्टूबर 1993 में स्थापित किया गया।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में एक अध्यक्ष जो कि सर्वोच्च न्यायालय का  सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश हो , इसके अतिरिक्त अन्य सदस्य उच्चतम न्यायालय के सेवारत या सेवा मुख्य न्यायाधीश होंगे। दो अन्य सदस्य ऐसे होते हैं जिन्हें मानवाधिकार का विशेष ज्ञान होता है किंतु दो सदस्यों में एक सदस्य को महासचिव बनाया जाता है उसे मुख्य कार्यपालिका अधिकारी सीईओ भी कहा जाता है यह आयोग नई दिल्ली में कार्य करता है लेकिन यह कहीं भी अपनी बैठकर आयोजित कर सकता है। 

आयोग के सदस्यों की नियुक्ति –

 आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली 6 सदस्य समिति की सिफारिश पर की जाती है। 
1. प्रधानमंत्री –  अध्यक्ष
2. लोकसभा का स्पीकर –  सदस्य 
3. केंद्रीय गृहमंत्री –  सदस्य 
4.लोकसभा के विपक्ष के नेता  – सदस्य
5. राज्यसभा में विपक्ष के नेता –  सदस्य
6. राज्यसभा उपसभापति  – सदस्य 

पदमुक्ति – 

 राष्ट्रपति द्वारा अध्यक्षता सदस्य को पद मुक्त किया जा सकता है । लेकिन पदमुक्ति से पूर्व उच्च न्यायालय द्वारा जांच कराई जाएगी, यदि जांच में अध्यक्ष या सदस्य दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें पद मुक्त किया जा सकता है । पदमुक्ति का आधार कदाचार अक्षमता होना चाहिए। इन आधारों पर राष्ट्रपति अध्यक्ष अथवा सदस्य को स्वयं के आदेश पर पद मुक्त कर सकते हैं। राष्ट्रपति अध्यक्ष या किसी सदस्य को उसके पद से हटा सकता है यदि वह – 
1.दिवालिया घोषित कर दिया गया हो।
 2.अपनी पदावधि के दौरान अपने पद के कर्तव्य कि अतिरिक्त किसी वह  अन्य अवैतनिक नियोजन में संलग्न रहा हो। 
3.वह मानसिक या शारीरिक शैथिल्य के कारण अपने पद पर बने रहने के योग्य ना रहा रह गया हो।
4. किसी सक्षम न्यायालय द्वारा उसे विकृत चित्त घोषित कर दिया गया हो ।
5. उसे ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्धि या दंडित किया गया हो जिसमें राष्ट्रपति की राय में नैतिक चरित्रहीनता घनिष्ठ रूप से संबंधित हो।
6. आयोग का अध्यक्ष या कोई भी सदस्य राष्ट्रपति को लिखित रूप से नोटिस देकर त्यागपत्र दे सकता है।

कार्यकाल – 

5 वर्ष या 70 वर्ष की आयु , पुनः नियुक्ति संभव पद से अवकाश के बाद ।
आयोग के कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए भारत सरकार आयोग को अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध कराती है जो निम्न प्रकार के होते हैं। 
•भारत सरकार का सचिव श्रेणी का अधिकारी जो आयोग का महासचिव होता है ।
•डीजीपी श्रेणी का पुलिस अधिकारी रहा हो और अन्य अधिकारी जो आयोग के कार्यों को कुशलतापूर्वक निष्पादित कर सके।
• वह प्रशासनिक तकनीकी वैज्ञानिक स्टाफ जिन की आवश्यकता हो।

आयोग के कार्य – 

•आयोग स्वप्रेरणा से पीड़ित व्यक्ति द्वारा अथवा उसकी ओर से किसी व्यक्ति द्वारा अपने समक्ष प्रस्तुत की गई याचिका पर मानवाधिकार के उल्लंघन या उसके लिए प्रेरित करने के लिए  समक्ष व्यक्तियों पर कार्रवाई की जाती है।
• किसी लोक सेवक द्वारा ऐसे उल्लंघन के निवारण में की गई उपेक्षा के परिवाद की जांच करेगा ।
•आयोग न्यायालय के समक्ष लंबित किसी ऐसी कार्यवाही पर न्यायालय के अनुमोदन से हस्तक्षेप कर सकता है जिसमें मानव अधिकारों के उल्लंघन का कोई कथन अंतर ग्रस्त हो।
•आयोग राज्य सरकार को सूचना देकर राज्य सरकार के नियंत्रण में रहने वाले किसी कारागार अथवा अन्य किसी संस्था का जहां व्यक्तियों को उपचार सुधार यह संरक्षण के लिए निरुद्ध किया जाता हो अंतः वासियों के रहन-सहन की स्थितियों का अध्ययन करने के लिए तथा उस पर सिफारिश करने के लिए निरीक्षण करेगा।
• आयोग मानवाधिकार के संरक्षण के लिए संविधान या उस समय लागू किसी विधि द्वारा या उसके अधीन प्रावधानित संरक्षण का पुनरावलोकन करेगा और उनके प्रभावी क्रियान्वयन हेतु सिफारिश करेगा।
• अयोग आतंकवाद की कार्यवाही सहित उन कारणों का पुनरावलोकन करेगा जो किसी के मानवाधिकार एवं उस समय लागू संरक्षण ओं के प्रयोग को प्रति सिद्ध करते हैं एवं उपयुक्त सिफारिश भी रहेगा।
मानवाधिकार आयोग के क्षेत्र में शोध करेगा तथा शोध कार्य को बढ़ावा देगा।
•अयोग मानवअधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं एवं गैर सरकारी संगठनों के प्रयासों को प्रोत्साहित करता है ।

आयोग की शक्तियां –

आयोग को मानवाधिकारों के उल्लंघन के संबंध में जांच करने का अधिकार है ऐसे समय में उसे सिविल न्यायालय की समस्त शक्तियां प्राप्त होती है ,उदाहरण निम्नलिखित है ।
• किसी दस्तावेज को खोलना और प्रस्तुत करना।
• किसी न्यायालय कार्यालय में किसी लोक अभिलेख उसकी  प्रति के लिए याचना करना ।
• शपथ पत्र पर साक्ष्य ग्रहण करना है।
• आयोग के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही को न्यायिक कार्यवाही माना जाता है। 

आयोग की अन्वेषण संबंधी शक्तियां – 

अयोग शिकायतों का निरीक्षण करते समय निम्नलिखित जांच करता है ।
1. आयोग केंद्र सरकार द्वारा या राज्य सरकार के किसी अधिकारी या जांच एजेंसी की सेवाओं का उपभोग कर केंद्र सरकार या राज्य सरकार की अनुमति से कर सकेगा।
2. अधिकारी  या एजेंसी जिसकी सेवाओं का उपयोग किया जाता है आयोग के नियंत्रणाधीन होगी।
3. किसी दस्तावेज की खोज करने एवं उसे प्रस्तुत करने की अपेक्षा कर सकेगा।
4.किसी कार्यालय से किसी लोग कोई ले गया उसकी प्रति के लिए अधियाचना कर सकेगा । 

मानवाधिकार के संरक्षण में अंबेडकर का योगदान – 

अंबेडकर का सम्पूर्ण जीवन मानवाधिकार के संरक्षण से संबंधित था। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में जो संघर्ष किया वह मानव अधिकार को संरक्षण प्रदान किया उल्लेखनीय है। मानव अधिकार की स्थापना के लिए संविधान निर्माता आधुनिक मनु की संज्ञा के रूप में आरक्षण के माध्यम से उन्होंने मानव अधिकार को मौलिक अधिकार में परिवर्तित किया। संविधान निर्माता के रूप में वे मानव अधिकार के संरक्षक थे अंबेडकर ने दलितों के उद्धार के लिए प्रत्येक कार्य किए। उन्होंने कहा कि वर्ण व्यवस्था जन्म पर आधारित है इसलिए इसका  विरोध करते हैं यह  धर्म एक व्यक्ति के मानवाधिकार के विरुद्ध है। उन्होंने मानवाधिकार के संबंध में ही धर्म परिवर्तन के विचार दिए और कहा कि ऐसा धर्म  जो एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति शोषण करें व मतभेद करें वह धर्म व्यवस्था ठीक नहीं है उन्होंने बुद्ध का अनुसरण किया हुआ 6 लाख बुध्दों के साथ धर्म परिवर्तन किया। अंबेडकर ने अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था ,मानवाधिकार के संरक्षण में की है।

मानव अधिकार के संरक्षण में बीसवीं सदी के अंतिम चरण से न्यायपालिका की भूमिका में वृद्धि हुई एवं मानवाधिकार के संरक्षण में लोकहित वाद भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। न्यायालय का अधिकार है कि वह जेलों के भीतर भी मानव अधिकार के हनन  की प्रक्रिया की जांच करें ,यदि अभियुक्त को अपने अधिकारों का ज्ञान नहीं है तो न्यायालय का दायित्व है कि वह व्यक्ति को इस विषय में जागृत करें।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में मानवाधिकार आंदोलन – 

नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार ने भारतीय संविधान के माध्यम से स्वतंत्र भारत के नागरिकों को पूर्ण मौलिक अधिकार प्रदान किए। संविधान लगभग उसी समय रचित मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा पत्र से प्रभावित था। सार्वभौमिक घोषणा पत्र में मौजूद अधिकारों पर आधारित  कई प्रावधान ग्रहण किए गए। गांधी जी के नेतृत्व में भारतीय संविधान के समाज में रचनात्मक ऊर्जा को जागृत किया इसी ऊर्जा ने भारतीय समाज में गांधीवादी आंदोलन के अंतर्गत अध्यात्मिक आत्म कल्याण के लक्ष्य को नया रूप दिया।
संयुक्त राष्ट्र अधिकार पत्र का बुनियादी लक्ष्य लिंग, नस्ल ,भाषा या धर्म का कोई भी भेद किए बिना सबके लिए मानवाधिकार और मूल स्वतंत्रताओं को आगे बढ़ाना व प्रोत्साहन देना है ।

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