Baal gangadhar tilak

बाल गंगाधर तिलक – 

तिलक एक राजनीतिक कार्यकर्ता थे। उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन का संचालन किया । इसी सन्दर्भ में उन्होंने अपने विचार व्यक्त किए।

 सन् 1856 में रत्नागिरि शहर में एक धार्मिक  विद्याभिमुख ब्राह्मण परिवार में लोकमान्य बलवन्तराव गंगाधर तिलक का जन्म हुआ था। देशभक्त, राष्ट्रनिर्माता, वेदवेत्त, महान गणितज्ञ, भगवद्गीता के विशाल भाष्यप्रणेता तिलक का हमारे देश के इतिहास में अनूठा स्थान है।

तिलक का सार्वजनिक जीवन 1880 में प्रारम्भ होता है। जब अपने एक साथी के साथ (चिपलूणकर ) मिलकर पूना में यू इंग्लिश स्कूल संस्था की स्थापना की। क्योंकि तिलक ने अंग्रेजी में शिक्षा ग्रहण की थी। उनका मानना था कि शिक्षा से ही भारत जागृत हो सकता है । 1881 में इन्होंने केसरी और मराठा दो पत्रिकाएं प्रारम्भ की ।

1890 के बाद वे कांग्रेस में बहुत शक्रिय हुये और इस काल में उनका सबसे प्रमुख कार्य कांग्रेस के दृष्टिकोण को बदलना था । कांग्रेस के अधिवेशनों में समाज सुधार की तुलना में राजनीतिक सुधार प्राथमिकता दी । इसलिए 1895 से उनके प्रयासों के फलस्वरूप कांग्रेस के वार्षिक सम्मेलनों में सामाजिक को सम्मेलन नही आयोजित किये जाते थे । इसका कारण यह है कि तिलक प्रारम्भ से यह मानते थे कि एक विदेशी सरकार को भारतीय समाज में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। इसलिए हम अंग्रेजों से समाज सुधार कानून नहीं मागेगें। इसी के तहत ब्रिटिश सरकार के समाज सुधार कानूनों का विरोध किया। 

जिनमें प्रमुख है – 

 Age of Consent Bill

1896 में ही महाराष्ट्र में अकाल पड़ा और 1897 में पूना में एक महामारी (प्लेग) हुयी । उस समय तिलक ने किसानों के अन्दोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने कृषकों से कर न देने का अभियान चलाया। इस प्रकार तिलक शिक्षित वर्ग व कृषक वर्ग दोनों को राष्ट्रीय आन्दोलन शामिल किया। 

तिलक कांग्रेस के उग्रवादी समूह प्रमुख नेता माने जाते हैं। उन्हीं के प्रयासों के फलस्वरूप 1907 में कांग्रेस में फूट पड़ी। 1908-1914 तक इन्हें राजद्रोह के अपराध में बन्दी बनाया गया। इसी के दौरान उन्होंने गीता का अध्ययन किया व गीता रहस्य ग्रंथ लिखा। जेल से छूटने के बाद वे राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हुये। इन्हीं के प्रयासों से 1916 में लखनऊ समझौता हुआ अथवा कांग्रेस व लीग में समझौता हुआ। उसके बाद तिलक ने एनी बेसेण्ट के साथ होमरूल लीग की स्थापना की। 

तिलक द्वारा रचित पुस्तकें-

• गीता रहस्य

• The Arctic Home in the vedas

• The Orion

• Srimad Bhagvad Gita

• Vedic charonalogy and Vedanta Jyolisha. 

तिलक के मुख्य राजनीतिक विचार – 

उग्रवाद सम्बन्धी विचार –  

  1.  तिलक कांग्रेस के उग्रवादी

गुट के नेता थे । इनका प्रमुख मतभेद कांग्रेस के उदारवादी या नरमदलीय नेताओं से था। दोनों के बीच मूलत: साधन के ऊपर मतभेद हुआ । नरमदलीय शान्तिपूर्ण साधनों क्रमिक सुधारों में विश्वास करते थे।    वहीं गरमदलीय प्रत्यक्ष कार्यवाही में विश्वास करते थें।

2.नरमदलीय याचनाएं व प्रार्थनाएं लिखते थे । समाचार पत्रों में लेख प्रकाशित करते थे । उनका उद्देश्य इंग्लैण्ड की जनमत को प्रभावित करना था । तिलक और उग्रवादियों का मानना था कि भारतीयों को ब्रिटिश नौकरशाही पर दबाव डालना चाहिए। क्योंकि भारत का शासन संचालन यही करते हैं।

3.नरमदलियों का साधन भिक्षावृत्ति है और उग्रवादियों का लक्ष्य आत्मनिर्भरता है । इस आत्मनिर्भरता के दो पहलू बताये-

A- राजनीतिक साधनों में भारतीय आत्मनिर्भर हैं वे विदेशी साधनों को तज दें।

B.आत्मनिर्भरता का अर्थ था आर्थिक आत्मनिर्भरता।

4. उनका मानना था कि अंग्रेज भारतीयों का शोषण

कर रहे हैं। भारतीय ब्रिटिश वस्तुओं के सबसे बड़ खरीददार हैं। इससे भारतीय यदि ब्रिटिश वस्तुओं को नहीं खरीदेगें तो ब्रिटिश का अर्थतन्त्र निर्बल हो जायेगा। 

5.जहाँ उदारवादी ब्रिटिश सरकार का समर्थन करते थे वहीं तिलक व अन्य उग्रवादी उसे अभिशाप समझते थे। उनका कहना था कि ये सरकार इतनी क्रूर व पापी है कि यह भारतीयों को कभी लाभ नहीं पहुंचा सकती इसलिए इसका विरोध करना चाहिए । 

7. ब्रिटिश नौकरशाही के स्थान पर भारतीयों का शासन स्थापित हो उनका मानना था कि भारतीय प्रशासक भारतीयों की समस्याओं के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। 

8. जहाँ उदारवादियों ने धर्म निरपेक्ष राजनीति की बात की वहीं उग्रवादियों ने धर्म व राजनीति को मिलाने का प्रयास किया | घोष का मानना था कि.. धर्म से सांस्कृतिक मूल्य उत्पन्न होते हैं, भारतीय संस्कृति से भारतीयों के चरित्र का विकास होता है। केवल पश्चिमी शिक्षा से भारतीयों का विराष्ट्रीकरण होता जा रहा है व मूल्यों से हटते जा रहे थे।

9. उदारवादी शान्तिपूर्ण तरीको वहीं उग्रवादी आन्दोलनकारी

साधनों के समर्थक थे । आन्दोलन के दो पहलू हैं !

(i) सार्वजानक स्तर पर शान्तिपूर्ण साधनों का समर्थन करते थे । इसके अतिरिक्त अप्रत्यक्ष रूप से क्रान्तिकारी साधनों का समर्थन करते थे। उन्होंने क्रान्ति व विद्रोह के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की।

(ii) तिलक ने चार प्रमुख साधनों वीं चर्चा की – 

a. स्वदेशी

b. बहिष्कार

c. निष्क्रिय प्रतिरोध

d. राष्ट्रीय शिक्षा

स्वदेशी व बहिष्कार दोनो अन्तरसम्बन्धित हैं, क्योंकि स्वदेशी का अर्थ है विदेशी का बहिष्कार करना। बहिष्कार का अर्थ विदेशी वस्तुओं, विचारों, संस्थाओं का बहिष्कार करना । परन्तु विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार सबसे व्यापक बहिष्कार है । स्वदेशी का प्रयोग करते हुये कांग्रेस के वार्षिक सम्मेलनों में औद्योगिक प्रदर्शनियाँ लगनी शुरू हुयीं जिनमें स्वदेशी की बिक्री होती थी । इस प्रकार आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की कोशिश की। 

तिलक के निष्क्रिय प्रतिरोध के तीन उद्देश्य थे-

1. शासकों के सम्मोहक प्रभाव को भंग करना जिसके द्वारा भारतवासी यह मानने लगे थे कि ब्रिटिश सरकार उनके लिए लाभदायी है ।

2. स्वतंत्रता के लिए भावनात्मक लगाव उत्पन्न करना । भारतीयों को आत्मत्याग व आत्मबलिदान के लिए तैयार करना ।

3. भारत में स्वशासन स्थापित करना ।

1906 में कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में निष्क्रिय प्रतिरोध के मूल सिद्धान्तों का विवरण दिया। – उन्होंने कहा कि भारतवासियों के पास शस्त्र नही है, उन्हें शस्त्रों की आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि उनके पास एक बहुत बड़ा राजनीतिक शस्त्र हैं वह है बहिष्कार। 

मुट्ठी भर अंग्रेज भारतीयों के माध्यम से भारत का शासन संचालन करते हैं इसलिए ब्रिटिश शासन का संचालन तो भारतीय करते हैं। लेकिन अंग्रेज भारतीयों को इसका आभास नहीं होने देते। 

अग्रेजो ने भारतीयों को लिपिक बनाकर रखा है परन्तु भारतीय अब शासन पर नियंत्रव चाहते हैं। यदि भारतीय शासन का संचालन नहीं करेंगे तो शासन सम्भव ही नहीं होगा ।भारतीयों का आह्वान करते हुये उन्होंने कहा है यदि तुमसे सक्रिय प्रतिरोध की शक्ति नहीं है तो क्या तुममें आत्मत्याग, आत्मसंयम की भी शक्ति नहीं है कि तुम अपने ऊपर शासन करने वाली विदेशी सरकार की सहायता न करो। इस प्रकार बहिष्कार ही निष्क्रिय प्रतिरोध का प्रमुख साधन है।

स्वराज व राष्ट्रवाद सम्बन्धी विचार- 

                                           तिलक ने भारतीयों का लक्ष्य स्वराज बताया । इस शब्द का प्रयोग विशिष्ट कारण

से किया।-

 वह मानते हैं कि भारतीयों को पाश्चात्य विचारों से प्रेरित नहीं कर सकते। इसलिए हमें भारतीय विचारों व भारतीय शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। 

तिलक का स्पष्ट रूप से मानना था कि भारतीय दर्शन  – 

 दर्शन व विचारधाराएं पाश्चात्य से सर्वश्रेष्ठ हैं, और इसमें उन्होंने सभी भारतीय ग्रन्थों से प्रेरणा ली। जैसे अर्थशास्त्र, शुक्रनीतिसार । लेकिन वो दो प्राचीन ग्रंथों से बहुत प्रभावित हुए – 

1.भगवद्गीता

2.वेद

उनका मानना था कि गीता में ही भारत के आदर्श प्रस्तुत किये गये हैं। यह आदर्श मूलतः दो है –

1. निष्काम कर्म का सिद्धान्त –

  जिसका अर्थ है कि अपना कर्म करो और परिणाम की ओर ध्यान मत दो। 

2. लोक संग्रह –

 सभी लोगो का कल्याण इसकी तुलना उन्होंने पाश्चात्य उदारवादी विचार से की । विशेषकर बेन्थम के सुखवादी सिद्धान्त से तुलना की । तिलक का मानना था कि सुखवाद केवल स्वहित को प्रेरित करता है। तिलक मानते है स्वहित भी दो प्रकार का होता है। एक वह स्वहित जिसमें व्यक्ति केवल अपने हितों की रक्षा करता है दूसरे की कोई चिन्ता नहीं करता इसे स्वार्थी स्वहित कहते हैं। 

दूसरा वह मानते हैं एक और स्वहित हैं जिसे वह जागृत स्वहित कहते हैं जिसकी चर्चा पश्चिमी विचारकों ने की है। अपने अतिरिक्त मनुष्य दूसरे पर ध्यान देता है क्योंकि मनुष्य  में स्नेह, परोपकार, प्रेम की भावना होती है।

फिर भी तिलक मानते हैं कि स्वहित हमारा दर्शन नहीं हो सकता क्योंकि जब – जब स्वहित व जनहित में टकराव होता है तो व्यक्ति स्वहित को ही चुनता है । इसलिए हमारा लक्ष्य लोकसमग्रह होना चाहिए। इसके अतिरिक्त वह कहते हैं कि बेन्थम का मानना है कि राज्य का लक्ष्म सर्वाधिक लोगों का सर्वाधिक सुख प्राप्त करना है इसी पर पश्चिमी विचारधारा आधारित है। तिलक ने पूछा सर्वाधिक सुख क्या है? इसे हम कैसे पायें ? क्या यह मात्रा के आधार पर होगा या गुणवत्ता।

यह विचार पश्चिम में स्पष्ट नहीं है। इसलिए हमें प्राचीन भारतीय दर्शन से प्रेरणा लेनी चाहिए।

इसी सन्दर्भ में स्वराज हमारा प्रमुख उद्देश्य है। तिलक ने स्वराज शब्दों वेदों के स्वराज्यम् से प्राप्त किया । वेदों में स्वराज्यम् के दो अर्थ हैं – 

a. इसका व्यक्तिगत अर्थ के तहत यह माना जाता है कि मनुष्य को स्वराज मिलना चाहिए क्योंकि मनुष्य ईश्वर का अंग होता है । ईश्वर स्वतंत्र होता है इसलिए मनुष्य में परमात्मा के समान नैसर्गिक स्वतंत्रता है। और यदि मनुष्य को कोई प्रताड़ित करने की कोशिश करता है तो मनुष्य उसका विरोध कर सकता है । क्योंकि मनुष्य स्वतंत्र है। ये दर्शन वेदान्त दर्शन कहलाता है। इसे विवेकानन्द ने भी अपनाया । इसे अव्दैत दर्शन कहते हैं। जिसमें माना जाता है कि आत्मा परमात्मा में घनिष्ठ सम्बन्ध है | आत्मा पूरमात्मा के कणों से बनी है इसलिए मृत्यु के बाद यही आत्मा परमात्मा में पुनः विलीन हो जाती है इसलिए ईश्वर के कुछ गुण हम में पाये जाते हैं।

b. तिलक के लिए स्वराज का अर्थ है सामुदायिक स्वतंत्रता। पूरे समूह की स्वतंत्रता। इसके 4 प्रमुख अंग है – 

1. शासक और शासित एक ही देश, एक ही प्रजाति, एक ही धर्म का होना चाहिए ।

2. सुशासन या कानून का शासन, व्यक्ति विशेष का शासन नहीं 

3. वह शासन जो जनता का कल्याण करे । 

4.जनता द्वारा निर्वाचित व जनता के प्रति उत्तरदायी शासन।

इसलिए 1916 लखनऊ में घोषित किया कि स्वराज की, इच्छा सुराज से पूरी नही हो सकती । इस प्रकार तिलक ने राष्ट्रवाद शब्द के प्रयोग के बिना भारतीय राष्ट्रवाद का उद्देश्य निर्धारित किया वह था स्वराज | ‘Rules of India’ भारतीयों का शासन। 

इस प्रकार तिलक के राष्ट्रवादी विचार भारतीय व पश्चात्य विचारों का मिश्रण है । तिलक का मानना था कि राष्ट्रवाद मूलत: एकता की भावना होती है। यह कोई दिखाई देने वाली वस्तु नही है । यह एक मनोभावना, मनोवृत्ति है | इस भावना के दो प्रमुख पहलू हैं ।

(i) क्षेत्रीय

(ii) राष्ट्रीय

क्षेत्रीय स्तर पर एकता किसी महानायक या धार्मिक उत्सव से उत्पन्न की जा सकती है । इसके लिए उन्होंने 1894 में गणपति त्योहार प्रारम्भ किया। गणपति त्यौहार महाराष्ट्र में अभिजनों का त्यौहार था । तिलक ने उसे जनता का त्योहार बनाया । इसके लिए उन्होंने कई नई परम्पराएं प्रारम्भ की । जैसे – बड़ी मूर्तियों की स्थापना, मूर्तियों के साथ, गीत के साथ जुलूस निकालना । इस जुलूस में राष्ट्रवादी गीत भी गाये जाते हैं। इस प्रकार उन्होंने महाराष्ट्र की ब्राह्मण और गैर ब्राह्मण, शिक्षित व अशिक्षित लोगों को जोड़ने का प्रयास किया। इसी प्रकार उन्होंने शिवाजी को एक प्रकार विद्रोह चिह्न के रूप में प्रयोग किया । उनसे प्रेरणा ली क्योंकि शिवाजी महाराष्ट्रियों के नायक थे ।

तिलक यह मानते थे कि भारतीय स्तर पर एकता की भावना की स्थापना आवश्यक है ।

निष्कर्ष – 

तिलक, गांधी, सरस्वती के बीच एक कड़ी के समान थे। अन्तर  केवल इतना है कि दयानन्द सामासिक सामाजिक व्यवस्था में बहुत प्रगतिशील थे। तिलक थोड़े रूढ़िवादी थे परन्तु दयानन्द ने भी स्वराज्य की चर्चा की। उसी को भारतीय का उद्देश्य बनाया किन्तु राष्ट्रवादी आन्दोलन  में गांधी ने सदैव वालकृष्ण को अपनी गुरु माना  –  तिलक का निष्क्रिय प्रतिरोध ही बाद में गांधी का असहयोग आंदोलन बना, अन्तर केवल यही है कि तिलक  मानते थे कि हिंसा का प्रयोग किया जाता है ,  जिसमे  वे गीता से प्रेरित है दुष्टो की नाश करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है किन्तु गांधी अहिंसा का  समर्थन करते हैं।

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