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Tuesday, 15 June 2021

दादा भाई नौरोजी

Dadabhai Naroji –

“Grand oldman of India”

‘भारत के महावृद्ध’ नाम से प्रसिद्ध दादा साहेब अर्थात Dadabhai_Naoroji (1825-1927) भारतीय राष्ट्रवाद के एक अग्रणी प्रस्तोता और उन्नायक थे। उनका जन्म 4 सितम्बर 1825 को हुआ था और 30 जून, 1917 को उनकी इहलीला समाप्त हुई। उन्होंने अपने जीवन में विविध प्रकार के अनुभव प्राप्त किये थे। उन पर दासता उन्मूलन’ आन्दोलन के अग्रगन्ता विलबरफोर्स, टॉमस क्लार्कसन तथा जैकेरी मैकॉले का प्रभाव पड़ा था। 1853 में उन्होंने कुछ अन्य सदस्यों के सहयोग से बम्बई संघ (बॉम्बे एसोसिएशन ) की स्थापना की। 1854 में बेल्फिस्टन कॉलिज, बम्बई में गणित तथा प्राकृतिक दर्शन के प्रोफेसर नियुक्त हुए। 1867 में उन्होंने तथा उनके कुछ मित्रों ने मिलकर लन्दन में ईस्ट इण्डिया एसोसिएशन की स्थापना की और 1869 में उसकी बम्बई शाखा की नींव डाली। 1873 में दादाभाई ने भारतीय वित्त की फौसिट प्रवर समिति के समक्ष साक्ष्य दिया। 1874 में उन्होंने बड़ौदा के दीवान पद पर काम किया। 1875 में वे बम्बई नगर महापालिका के सदस्य बने। 1885 में उन्हें बम्बई प्रान्तीय विधान परिषद का सदस्य नामांकित किया गया। अपने महान् अध्यवसाय तथा लगन के फलस्वरूप 1892 में वे भारत के पक्ष का प्रतिनिधित्व करने के लिए केन्द्रीय फिन्सबरी निर्वाचन क्षेत्र से ब्रिटिश लोक सभा (हाउस ऑफ कॉमन्स) के सदस्य चुने गये। वे 1892 से 1895 तक ब्रिटिश संसद के सदस्य रहे। इंगलैण्ड में अपने दीर्घ प्रवास के दौरान उन्होंने ग्लैड्स्टन, बैंडलॉ, ब्राइट और ड्यूक आर्गिल से सार्थक मैत्री स्थापित की। दादाभाई तथा चार्ल्स बैडलॉ के सतत् प्रयत्नों के फलस्वरूप ब्रिटिश लोक सभा में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें सिफारिश की गयी कि सभी प्रकार की साम्राज्यीय सेवाओं के लिए इंगलैण्ड तथा भारत में साथ-साथ परीक्षाएँ ली जायें। 1897 में दादाभाई भारतीय व्यय के वैब्ली आयोग के समक्ष उपस्थित हुए और आयोग को अनेक टिप्पणियाँ प्रस्तुत कीं। उन्होंने इस बात पर खेद प्रकट किया कि 1857 के विद्रोह को दबाने का व्यय तथा अबीसीनिया के अभियान और चितराल सहित सीमान्त युद्धों का सम्पूर्ण व्यय भारत के मत्थे मढ़ दिया गया था। उन्होंने अविचल लगन तथा महान् साहस के साथ लगभग साठ वर्ष तक भारतमाता के पुनरुद्धार के लिए अथक प्रयत्न किया। सभी वर्गों के भारतीयों ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की और उनका आदर किया। वे आत्मत्याग की मूर्ति थे और पारसी धर्म के श्रेष्ठतम आदर्शों के प्रतिनिधि थे। उन्हें भारतीय अर्थतन्त्र तथा वित्त का अद्वितीय ज्ञान था। उनकी रचनाएँ प्रसादगुण, तथ्यों की अधिकारपूर्ण विवेचना और वस्तुगत बौद्धिक दृष्टिकोण से युक्त हैं। दादाभाई ने स्कूल के अध्यापक प्रोफेसर, व्यवसायी, प्रशासक, ब्रिटिश संसद के सदस्य और तीन बार भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के सभापति के रूप में देश की सेवा की। जीवन के इन सभी क्षेत्रों में उन्होंने कष्टसहन, आत्मत्याग, अनुरागपूर्ण देशभक्ति और निष्कलंक ईमानदारी का गौरवपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत किया। वे सचमुच भारतीय राष्ट्रवाद के पथ-अन्वेषक थे।

शिक्षा के सम्बन्ध में विचार – 

दादाभाई का विश्वास था कि राजनीतिक प्रगति के लिए शिक्षा का प्रसार बहुत आवश्यक है। शिक्षा के द्वारा केवल व्यक्ति की आत्मा ही ज्ञान से प्रदीप्त नहीं होती, वह लोगों के मन में अधिकारों की चेतना भी उत्पन्न करती है। उन्हें विश्वास था कि शिक्षा के प्रसार और प्रशासनिक अनुभव के संचय से स्वराज की ओर प्रगति की गति तीव्र होगी। इसलिए उन्होंने ‘निःशुल्क अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा तथा हर प्रकार की निःशुल्क शिक्षा’ की मांग की।

दादाभाई के भारतीय सामाजिक विज्ञानों को दो मुख्य योगदान हैं। प्रथम, उन्होंने भारतीय राजनीति की आर्थिक व्याख्या प्रस्तुत की।’ दूसरे, अर्थशास्त्रीय अनुसन्धान के क्षेत्र में वैज्ञानिक वस्तुगत पद्धति का अनुसरण किया। अतः उनकी पद्धति अर्थशास्त्रीय थी न कि संवेगात्मक तथा भावुक। उन्होंने भारतीय जनता को देश के साधनों के निर्गम के प्रति सचेत किया। इस प्रकार भारतीय अर्थशास्त्र के क्षेत्र में वे प्रमुख विद्वान बन गये।

दूसरे, दादाभाई ने अपनी भारतीय अर्थशास्त्र तथा राजनीति सम्बन्धी रचनाओं में ‘अधिकार’ की धारणा को महत्व दिया। उन्नीसवीं शताब्दी के छठे तथा सातवें दशकों को उन्होंने ‘प्राकृतिक अधिकार’ की धारणा का उल्लेख किया। 1906 में कलकत्ता काँग्रेस के अवसर पर अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने भारतवासियों के लिए दो प्रकार के अधिकारों के आधार पर ब्रिटिश नागिरकता का दावा किया (1) जन्मसिद्ध अधिकार, तथा (2) प्रतिज्ञामूलक अधिकार। उनकी माँग थी कि भारतवासियों को दो अधिकार तुरन्त दे दिये जायें : (1) लोक सेवाओं में नौकरियाँ, तथा (2) प्रतिनिधित्व। उन्होंने इस बात पर सदैव बल दिया कि भारतवासी ब्रिटिश नागरिक हैं, और इसलिए वे ब्रिटिश नागरिकता से सम्बद्ध सब अधिकारों और विशेषाधिकारों के हकदार हैं।

राजनीति के सम्बन्ध में दादाभाई की पद्धति नैतिक थी। उनका व्यक्तिगत जीवन अलौकिक पवित्रता का जीवन था। अपने राजनीतिक कार्यकलाप में भी उन्होंने वैसे ही नैतिक उत्साह से काम लिया। भारत के प्रति उनकी भक्ति गम्भीर तथा हार्दिक थी, और राजनीतिक क्षेत्र में उन्होंने अनन्य भक्ति तथा आत्म-त्याग से युक्त समर्पण की भावना से कार्य किया। वे शुद्ध, गम्भीर तथा अविकल देशभक्ति के साक्षात् अवतार थे। उन्होंने राजनीतिक आन्दोलन का मार्ग इसलिए अपनाया कि वे उसे भारत की आर्थिक तथा सामाजिक पुनस्थापना तथा प्रगति के लिए सर्वाधिक शक्तिशाली कार्य प्रणाली मानते थे। उनका विश्वास था कि भारत की आशा, शक्ति तथा होतव्यता केवल स्वराज्य पर निर्भर है। देश के उद्धार के लिए उनके महान् कार्यों ने गोखले को प्रभावित किया। इस प्रकार भारतीय राष्ट्रवाद के इस श्रद्धेय पितामह ने अपने जीवन तथा कर्म की पवित्रीकृत सत्यता के द्वारा राजनीति के नैतिकीकरण की धारणा को शक्ति प्रदान की।

दादाभाई नौरोजी के राजनीतिक विचार-

राजनीतिक सत्ता के नैतिक आधार के सिद्धान्त को उदारवाद के सभी भारतीय समर्थकों ने स्वीकार किया। है। न्याय, उदारता और मानवता ही ऐसे सुनहरी बन्धन हैं जो राजनीतिक व्यवस्था की एकता को कायम रख सकते हैं। कोई राजनीतिक व्यवस्था दीर्घजीवी तभी हो सकती है जब उसके नागरिकों में इच्छा तथा आकांक्षाओं का तादात्म्य हो । दादाभाई लिखते हैं: “आप एक साम्राज्य का निर्माण अस्त्र-शस्त्रों के द्वारा अथवा नाशवान पाशविक भौतिक शक्ति के बल पर कर सकते हैं, किन्तु उसका परिरक्षण केवल शाश्वत सैनिक शक्ति के द्वारा ही किया जा सकता है। पाशविक बल कभी न कभी छिन्न-भिन्न हो जायेगा; केवल धर्म शाश्वत है।  हृदय, अनुभूति और भावनाओं की एकता ही राजनीतिक शक्ति का वास्तविक आधार है। शक्ति को सत्ता का आधार मानना एक साधारण और घिसापिटा दृष्टिकोण है, किन्तु गहराई से जाँच करने पर इस प्रकार की धारणा का खोखलापन प्रकट हो जाता है। दादाभाई ने लिखा है : “यदि वे यह समझते हैं कि उनके असैनिक अधिकारियों अथवा ब्रिटेन की जनता की सुरक्षा का भारतवासियों के सन्तोष के बजाय कोई अन्य साधन हो सकता है तो वे अपने को धोखा दे रहे हैं। उनका सैन्य बल कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, भारत में उनके शासन की सुरक्षा पूर्णतः भारतवासियों के सन्तोष पर ही निर्भर है। पाशविक बल से एक साम्राज्य का निर्माण किया जा सकता है, किन्तु पाशविक बल उसका परिरक्षण नहीं कर सकता, केवल नैतिक बल, न्याय तथा धर्म उसकी रक्षा करने में समर्थ हो सकते हैं।””

 

 

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