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Friday, 16 April 2021

Amendment of the constitution

Amendment of the constitution of India – 

 भारतीय संविधान में संविधान संशोधन का उल्लेख भाग – 20 और अनुच्छेद 368 के अंतर्गत किया गया है।भारतीय संविधान में कठोर एवं सरल दोनों प्रकार की प्रक्रियाओं का मिश्रण किया गया है, जिसमें संविधान संशोधन की प्रक्रिया में शक्ति का उल्लेख है।
बदलते हुए विश्व के परिवेश में परिवर्तन की आवश्यकता होती है,  इसलिए सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक संविधान में संशोधन की व्यवस्था की जाती है जिसके द्वारा परिवर्तित परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को अनुकूल बना सके । 
भारतीय संविधान अत्यधिक विस्तृत है इसमें राज्य के संविधान भी सम्मिलित हैं और स्थानीय स्वशासन वाले प्रावधान भी सम्मिलित हैं इसलिए राज्यों से संबंधित किसी भी परिवर्तन के लिए संविधान संशोधन करना पड़ता है जैसे कि राज्यों का निर्माण राज्यों के नाम में परिवर्तन इत्यादि 
संविधान लक्ष्य की प्राप्ति का साधन है जबकि संविधान का उद्देश्य आर्थिक सामाजिक एवं राजनीतिक न्याय की स्थापना करना है।

संविधान संशोधन के प्रकार –

भारतीय संविधान में संशोधन तीन प्रकार से किया जाता है।
1. संसद के साधारण बहुमत द्वारा संशोधन
2. संसद के विशेष बहुमत द्वारा संशोधन
3.संसद के विशेष बहुमत द्वारा एवं आधे राज्य विधान मंडलों की संस्तुति के उपरांत संशोधन 
 पहला संशोधन (1951) – इस संशोधन द्वारा नौवीं अनुसूची को शामिल किया गया।
 दूसरा संशोधन (1952) – संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व को निर्धारित किया गया।
सातवां संशोधन (1956) – इस संशोधन द्वारा राज्यों का अ, ब, स और द वर्गों में विभाजन समाप्त कर उन्हें 14 राज्यों और 6 केंद्रशासित क्षेत्रों में विभक्त कर दिया गया।
 दसवां संशोधन (1961) – दादरा और नगर हवेली को भारतीय संघ में शामिल कर उन्हें संघीय क्षेत्र की स्थिति प्रदान की गई।
12वां संशोधन (1962) – गोवा, दमन और दीव का भारतीय संघ में एकीकरण किया गया।
 13वां संशोधन (1962) – संविधान में एक नया अनुच्छेद 371 (अ) जोड़ा गया, जिसमें नागालैंड के प्रशासन के लिए कुछ विशेष प्रावधान किए गए। 1दिसंबर, 1963 को नागालैंड को एक राज्य की स्थिति प्रदान कर दी गई।
 14वां संशोधन (1963) – पांडिचेरी को संघ राज्य क्षेत्र के रूप में प्रथम अनुसूची में जोड़ा गया तथा इन संघ राज्य क्षेत्रों (हिमाचल प्रदेश, गोवा, दमन और दीव, पांडिचेरी और मणिपुर) में विधानसभाओं की स्थापना की व्यवस्था की गई।
21वां संशोधन (1967) – आठवीं अनुसूची में ‘सिंधी’ भाषा को जोड़ा गया।
 22वां संशोधन (1968) – संसद को मेघालय को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित करने तथा उसके लिए विधानमंडल और मंत्रिपरिषद का उपबंध करने की शक्ति प्रदान की गई।
24वां संशोधन (1971) – संसद को मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन का अधिकार दिया गया।
 27वां संशोधन (1971) – उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र के पाँच राज्यों तत्कालीन असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर व त्रिपुरा तथा दो संघीय क्षेत्रों मिजोरम और अरुणालच प्रदेश का गठन किया गया तथा इनमें समन्वय और सहयोग के लिए एक ‘पूर्वोत्तर सीमांत परिषद्’ की स्थापना की गई।
31वां संशोधन (1974) – लोकसभा की अधिकतम सदंस्य संख्या 545 निश्चित की गई। इनमें से 543 निर्वाचित व 2 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होंगे।
36वां संशोधन (1975) – सिक्किम को भारतीय संघ में 22वें राज्य के रूप में प्रवेश दिया गया।
 37वां संशोधन (1975) – अरुणाचल प्रदेश में व्यवस्थापिका तथा मंत्रिपरिषद् की स्थापना की गई।
 42वां संशोधन (1976) – इसे ‘लघु संविधान’ (Mini Constitution) की संज्ञा प्रदान की गई है।
* इसके द्वारा संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’, ‘समाजवादी’ और ‘अखंडता’ शब्द जोड़े गए।
*  इसके द्वारा अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों की व्यवस्था करते हुए नागरिकों के 10 मूल कर्त्तव्य निश्चित किए गए।
*  लोकसभा तथा विधानसभाओं के कार्यकाल में एक वर्ष की वृद्धि की गई।
* नीति-निर्देशक तत्वों में कुछ नवीन तत्व जोड़े गए।
*  इसके द्वारा शिक्षा, नाप-तौल, वन और जंगली जानवर तथा पक्षियों की रक्षा, ये विषय राज्य सूची से निकालकर समवर्ती सूची में रख दिए गए।
*  यह व्यवस्था की गई कि अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत आपातकाल संपूर्ण देश में लागू किया जा सकता है या देश के किसी एक या कुछ भागों के लिए।
*  संसद द्वारा किए गए संविधान संशोधन को न्यायालय में चुनौती देने से वर्जित कर दिया गया।
 44वां संशोधन (1978) – संपत्ति के मूलाधिकार को समाप्त करके इसे विधिक अधिकार बना दिया गया।
*  लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं की अवधि पुनः 5 वर्ष कर दी गई।
* राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष्ज्ञ के चुनाव विवादों की सुनवाई का अधिकार पुनः सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालय को ही दे दिया गया।
* मंत्रिमंडल द्वारा राष्ट्रपति को जो भी परामर्श दिया जाएगा, राष्ट्रपति मंत्रिमंडल को उस पर दोबारा विचार करने लिए कह सकेंगे लेकिन पुनर्विचार के बाद मंत्रिमंडल राष्ट्रपति को जो भी परामर्श देगा, राष्ट्रपति उस परामर्श को अनिवार्यतः स्वीकार करेंगे।
*  ‘व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार’ को शासन के द्वारा आपातकाल में भी स्थगित या सीमित नहीं किया जा सकता, आदि।
 52वां संशोधन (1985) – इस संशोधन द्वारा संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई। इसके द्वारा राजनीतिक दल-बदल पर कानूनी रोक लगाने की चेष्टा की गई है।
55वां संशोधन (1986) – अरुणाचल प्रदेश को भारतीय संघ के अन्तर्गत राज्य की दर्जा प्रदान की गई।
56वां संशोधन (1987) – इसमें गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा देने तथा ‘दमन व दीव’ को नया संघीय क्षेत्र बनाने की व्यवस्था है।
61वां संशोधन (1989) – मताधिकार के लिए न्यूनतम आवश्यक आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई।
65वां संशोधन (1990) – ‘अनुसूचित जाति तथा जनजाति आयोग’ के गठन की व्यवस्था की गई।
                                                 
67 वां संविधान संशोधन (1990 ) – अनुच्छेद 356 में संशोधन करके पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अवधि 4 वर्ष तक कर दी गई ।
71 वां  संविधान संशोधन (1992 )- संविधान की आठवीं अनुसूची में तीन और भाषाओं को सम्मिलित किया गया,कोंकणी मणिपुरी और नेपाली जिससे आठवीं अनुसूची में भाषाओं की संख्या 18 हो गई ।
72 वा संविधान संशोधन (1992) – त्रिपुरा विधानसभा में सीटों की संख्या बढ़ाकर 60 कर दी गई और उसी अनुपात में अनुसूचित जातियों के लिए स्थान आरक्षित किया गया । 
73 वा संविधान संशोधन ( 1993 ) – संविधान के भाग 9 तथा अनुच्छेद 243, 243 (क) और 11वीं अनुसूची को जोड़कर संपूर्ण भारत में पंचायती राज की स्थापना का प्रावधान किया गया ।
74 वां संविधान संशोधन (1993) – संविधान में भाग 9 का अनुच्छेद 243(त) 243(छ) और बारहवीं अनुसूची जोड़कर नगरीय स्थानीय शासन को संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया गया ।
75 वां संविधान संशोधन (1994) – किराएदार और मकान मालिकों के विवाद को समझाने के लिए राज्यों में ट्रिब्यूनल ओं की व्यवस्था की गई।
84 वां संविधान संशोधन ( 2001) – लोकसभा तथा विधानसभाओं की सीटों की संख्या में वर्ष 2026 तक कोई परिवर्तन न करने का प्रावधान किया गया है ।
86 वां संविधान संशोधन (2002) – संविधान में अनुच्छेद 21( क) शामिल किया गया है जिसके तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए अनिवार्य एवं निशुल्क शिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने की व्यवस्था की गई है ।
भाग 4 के अनुच्छेद 45 में परिवर्तन करके यह शामिल किया गया कि जीरो से 6 वर्ष के बच्चों की सुरक्षा और देखभाल का दायित्व राज्य पर होगा । अनुच्छेद 51 (क) के द्वारा 11वां कर्तव्य जोड़ा गया जिसके तहत माता-पिता या संरक्षक का कर्तव्य होगा कि 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की जाए ।
  89 वां संविधान संशोधन ( 2003 ) – अनुच्छेद 338 (क) को संविधान में शामिल कर अनुसूचित जनजाति के लिए पृथक राज्य आयोग की स्थापना की व्यवस्था की गई।
91 वां संविधान संशोधन (2003) – दसवीं अनुसूची में संशोधन करके दलबदल व्यवस्था को और कठोर बना दिया गया अब केवल संपूर्ण दल के विलय को मान्यता दी जाएगी । 
92  वां संविधान संशोधन (2003) – संविधान की आठवीं अनुसूची में बोडो,डोगरी, मैथिली और संथाली भाषाओं को शामिल किया गया इस प्रकार अब आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएं हो गई।
93 वां संविधान संशोधन (2006) – शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति /जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के नागरिकों के दाखिले के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 15 की धारा 4 के प्रावधानों के तहत की गई है ।
100 वां संविधान संशोधन (2015) –  संविधान संशोधन के माध्यम से भारत और बांग्लादेश के मध्य भूमि सीमा समझौता लागू किया गया । वर्ष 1974 में विपक्षी भूमि सीमा समझौते के तहत कुछ क्षेत्रों की अदला-बदली की गई थी जिससे असम , पश्चिम बंगाल ,मेघालय एवं त्रिपुरा की सीमाएं प्रभावित हुई ।
101  वां संविधान संशोधन (2016) –  संविधान में एक नया अनुच्छेद 246- (क) जोड़ा गया जो प्रावधान करता है कि संसद और  राज्य की विधानसभाओं  दोनों को वस्तु एवं सेवा कर से संबंधित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है ।
102 वां संविधान संशोधन (2018) – 11 अगस्त 2018 से प्रभावी इसअधिनियम के द्वारा संविधान में अनुच्छेद 338  (ख) जोड़कर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक स्थिति प्रदान की गई ।
103 वां संविधान संशोधन (2019) – आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को सरकारी नौकरियों तथा शिक्षण संस्थाओं में 10% आरक्षण देने का संविधान में प्रावधान करने के लिए संसद में 126 वां संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया गया । इस विधेयक द्वारा अनुच्छेद 15 तथा 16 में संशोधन किया गया है। संसद में पारित होने तथा राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के पश्चात यह विधेयक 103 वां संविधान संशोधन अधिनियम के रूप में 14 जनवरी 2019 से प्रभावी हो गया है। 

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