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Saturday, 2 January 2021

Soils of India

 

भारत की प्रमुख मिट्टियां – 

पृथ्वी के धरातल पर मिट्टी के तत्व एवं पदार्थों की एक परत होती है ,जो अपक्षय और विघटन के माध्यम से चट्टानों और जैव पदार्थों से बनी होती है। वनस्पति तथा जीव जंतुओं के सड़े -गले अंश भी मिट्टी में सम्मिलित हो जाते हैं जिसे ह्यूमस (Humas) कहा जाता है। मिट्टी की प्राकृतिक क्षमता उर्वरता कहलाती है । मिट्टी की प्रकृति में अम्लीय व क्षारीय मृदा होती है।अम्लीय मृदा का ph मान 7 से कम होता है। क्षारीय मृदा का ph मान  7 से अधिक होता है।

.भारतीय मृदा को 8 वर्गों में विभाजित किया गया है ।

भारतीय मिट्टी(Soils) को 8 प्रमुख वर्गों में बांटा गया है ।

1.जलोढ़ मिट्टी ( Alluvial soil )

भारतीय मृदा  में जलोढ़ मृदा सर्वाधिक महत्वपूर्ण मिट्टी मानी जाती है l भारत में लगभग जलोढ़ मृदा का 40% क्षेत्र विस्तार हैl
यह मिट्टी हिमालय और निकटवर्ती क्षेत्रों से निकलने वाली सतलज , गंगा ब्रह्मपुत्र और उनकी सहायक नदियों के अवसादो से निर्मित होती है l यह मिट्टी कावेरी नदी के डेल्टा प्रदेश में पाई जाती हैं, इसलिए इस मिट्टी को डेल्टाई मृदा भी कहते हैं। जलोढ़ मिट्टी में पोटाश की मात्रा अधिक तथा फास्फोरस की मात्रा कम पाई जाती है इस मिट्टी का रंग हल्के धूसर से राख जैसा होता है। 

*जलोढ़ मिट्टी को आयु के आधार पर निम्न 2 वर्गों में विभाजित किया जाता है।

A. प्राचीन जलोढ़ –

प्राचीन जलोढ़ को बांगर मिट्टी कहते हैं इसमें सोडियम लवण अधिक होने के कारण यह क्षारीय होती है।

B. नवीन जलोढ़ – 

नवीन जलोढ़ को खादर मिट्टी कहते हैं ।नवीन जलोढ़ मृदा में सबसे अधिक उर्वर होती हैं । 

2. काली या  रेगुर मिट्टी(Black or regur soil)- 

बेसाल्ट चट्टान के नीचे तथा उनके विखंडन से काली मिट्टी का निर्माण हुआ है। इसमें लोहे के कण सापेक्षत: अधिक होते हैं। काली मिट्टी दक्कन के पठार की प्रमुख  मिट्टी है, गहरी अपारगम्य होती है तथा गीली होने पर यह मृदा फूलकर चिपचिपी हो जाती है, सूखने पर यह सिकुड़ जाती है। यह मिट्टी कपास की खेती के लिए उपयुक्त होती है इस मिट्टी में कपास उत्पन्न होने के कारण इसे कपासी मृदा भी कहते हैं ।

3. लाल- पीली मिट्टीमिट्टी (Red-yellow soil)

इस प्रकार की मिट्टी का विकास उन क्षेत्रों में होता है जहां पर रवेदार अग्नेय  चट्टाने पाई जाती हैं। यह मिट्टी दक्कन के पठार के पूर्वी तथा दक्षिण भाग में कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पाई जाती है। लाल मिट्टी जलयोजित होने के कारण पीली दिखने लगती है। महीन कण वाली लाल व पीली मिट्टी सामान्यतः उर्वर होती है।

4. लेटराइट मिट्टी (Laterite soil)

यह मिट्टी उच्च तापमान व भारी वर्षा के क्षेत्र में पाई जाती है यह प्रमुखता उष्णकटिबंधीय वर्षा के कारण उत्पन्न होती हैं । इस मिट्टी में   आक्साइड व पोटाश की अधिकता तथा नाइट्रोजन फास्फेट एवं कैल्शियम की कमी होती है। इस मिट्टी का प्रयोग ईट बनाने में किया जाता है। या मिट्टी मुख्यतः कर्नाटक केरल, तमिलनाडु, असम के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।

5. मरुस्थलीय मिट्टी (Desert soil) –

यह मिट्टी पश्चिमी राजस्थान दक्षिणी हरियाणा पंजाब एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में पाई जाती है। यह मिट्टी पवन द्वारा उड़ा कर लाई गई रेतीली (बलुई मिट्टी) सिंचाई की सुविधा मिल जाने पर अच्छी उपज देती है। राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर के द्वारा मरुस्थलीय मिट्टी की सिंचाई करके सरसों ,चना ,कपास ,गेहूं आदि फसल पैदा की जाती है इस मिट्टी को  उर्वरक की श्रेणी में शामिल  नहीं किया गया है क्योंकि इसमें  ह्यूमस एवं जैव पदार्थ का मात्रा में पाए जाते हैं।

6. पर्वतीय/ वनीय मिट्टी( Hilly/Forest soil)-

यह मिट्टी पर्वतीय ढलानों मध्य एवं शिवालिक हिमालय, पूर्वोत्तर भारत ,दक्षिण भारत की पहाड़ियों पर पायी जाती है । इस मिट्टी में नाइट्रोजन, ह्मयूमस पर्याप्त मात्रा में होता है तथा इसमें कहीं कहीं कंकड़ पत्थर के टुकड़े भी मिलते हैं। इस मिट्टी में इस मिट्टी में सेब, चाय केसर की खेती की जाती है। असम की पर्वतीय मिट्टियों में चाय, चावल तथा आलू की खेती होती है।

7. पीठ एवं जैव मृदा(Peat and biotic)- 

यह मिट्टी मुख्यता अधिक वर्षा एवं अधिक नमी वाले क्षेत्रों में पाई जाती है। इस मिट्टी में जीवाशम के अंश पर्याप्त होते हैं इसलिए ह्यूमस अधिक पाया जाता है। उमस के कारण या मिट्टी भारी एवं गहरे रंग की होती है तथा इसमें लोहे के अंश भी प्राप्त होते हैं। इसमें फास्फोरस एवं अमोनियम सल्फेट अधिक होने के कारण यह पौधों के विकास के लिए हानिकारक है। यह मिट्टी बिहार, उड़ीसा पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु ,उत्तराखंड में पाई जाती है।

8. लवणीय मृदा(Saline soil)

भारत में दलदली शुष्क अर्ध शुष्क भागों में लवणीय मृदा पाई जाती है इसका विस्तार कच्छ के रण में सर्वाधिक होता है। उत्तर प्रदेश में इन्हें रेह या उसर, बिहार में चोपन, गुजरात में खार या लोपा, हरियाणा में थूर या कल्लर, केरल में कारी नाम से लोग पुकारते हैं। जिप्सम का प्रयोग करके लावणी मिट्टियों को कृषि योग्य बनाया जाता है।

#संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ष 2015 को अंतर्राष्ट्रीय मृदा दिवस घोषित किया गया। वर्ष 2015 को अंतरराष्ट्रीय मृदा वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय व मृदा के महत्व को बढ़ाना एवं वैश्विक ध्यान आकर्षित करना था। महासभा की इस बैठक से 5 दिसंबर, 2014 को विश्व मृदा दिवस मनाना प्रारंभ किया गया।


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