संविधान की प्रमुख अनुसूचियां

 भारतीय संविधान की छठवीं अनुसूची – 

नमस्कार दोस्तो , आज हम आपको सामान्य ज्ञान के ऐसे महत्त्वपूर्ण विषय  के बारे में बताने जा रहे है जो हर प्रतियोगी परीक्षा में आते   है ,तो आप इन्हें अच्छे से पढ लीजिये और याद कर लीजिये ताकि इनमें से कोई भी प्रश्न परीक्षाओं में आ जाये तो किसी हालत में गलत नहीं होना चाहिये !

😊 संविधान की छठी अनुसूची

वर्तमान में छठी अनुसूची के अंतर्गत चार पूर्वोत्तर राज्यों असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा की 10 स्वायत्त जिला परिषदें शामिल हैं।
😊 1949 में संविधान सभा द्वारा पारित छठी अनुसूची, स्वायत्त क्षेत्रीय परिषद और स्वायत्त ज़िला परिषदों  के माध्यम से आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा का प्रावधान है।
😊 यह विशेष प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 244 (2) और अनुच्छेद 275 (1)के तहत किया गया है।
छठी अनुसूची के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित है!
इसके अंतर्गत चार राज्यों- असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्त ज़िलों के रूप में गठित किया गया है, किंतु इन्हें संबंधित राज्य के कार्यकारी प्राधिकरण के अधीन रखा गया है।
राज्यपाल को स्वायत्त ज़िलों को गठित करने और पुनर्गठित करने का अधिकार है।
 एक स्वायत्त ज़िले में अलग-अलग जनजातियाँ हैं, तो राज्यपाल  उस ज़िले को कई स्वायत्त क्षेत्रों में विभाजित कर सकता है।
संरचना प्रत्येक स्वायत्त जिले में एक जिला परिषद होती है,जिसमें 30 सदस्य होते हैं। जिनमें से चार राज्यपाल द्वारा नामित किए जाते हैं और शेष 26 वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाते हैं।
कार्यकाल: निर्वाचित सदस्य पाँच साल के कार्यकाल के लिये पद धारण करते हैं यदि परिषद को इससे पूर्व भंग नहीं किया जाता है और मनोनीत सदस्य राज्यपाल के इच्छानुसार समय तक पद पर बने रहते हैं।
प्रत्येक स्वायत्त क्षेत्र में एक अलग क्षेत्रीय परिषदभी होती है।
परिषदों की शक्तियां: ज़िला और क्षेत्रीय परिषदें अपने अधिकार क्षेत्र के तहत क्षेत्रों का प्रशासन करती हैं। वे भूमि,वन, नहर के जल, स्थानांतरित कृषि, ग्राम प्रशासन, संपत्ति का उत्तराधिकार, विवाह एवं तलाक, सामाजिक रीति-रिवाजों जैसे कुछ निर्दिष्ट मामलों पर कानून बना सकती हैं, किंतु ऐसे सभी कानूनों के लिये राज्यपाल की सहमति आवश्यक है।
ग्राम सभाएँ: अपने क्षेत्रीय न्यायालयों के अंतर्गत ज़िला और क्षेत्रीय परिषदें जनजातियों के मध्य मुकदमों एवं मामलों की सुनवाई के लिये ग्राम परिषदों या अदालतों का गठन कर सकती हैं। वे उनकी अपील सुनते हैं। इन मुकदमों और मामलों पर उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र राज्यपाल द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है।
शक्तियाँ और कार्य:ज़िला परिषद ज़िले में प्राथमिक स्कूलों, औषधालयों, बाज़ारों, मत्स्य पालन क्षेत्रों, सड़कों आदि की स्थापना, निर्माण या प्रबंधन कर सकती है। यह गैर आदिवासियों द्वारा ऋण एवं व्यापार के नियंत्रण के लिये नियम भी बना सकता है लेकिन ऐसे नियमों के लिये राज्यपाल की सहमति की आवश्यकता होती है। जिला और क्षेत्रीय परिषदों को भूमि राजस्व का आकलन करने, संग्रह करने तथा कुछ निर्दिष्ट करों को लगाने का अधिकार है
अपवाद: संसद या राज्य की विधायिका के अधिनियम स्वायत्त ज़िलों और स्वायत्त क्षेत्रों पर लागू नहीं होते हैं या दिशानिर्देश  संशोधनों और अपवादों के साथ लागू होते हैं।
राज्यपाल स्वायत्त ज़िलों या क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित किसी भी मामले की जाँच और रिपोर्ट करने के लिये एक आयोग नियुक्त कर सकते हैं।

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