मानवेन्द्र नाथ राय

  1. M.N.Roy

मानवेन्द्र नाथ राय (1886-1954)
मानवेन्द्र नाथ का  उनका मूल नाम नहीं था
उनका  मूल नाम नरेद्रनाथ भट्टाचार्य था। इनकी विशेषता इन्होने भारतीय चिन्तन में भारतीय राष्ट्रवाद को मार्क्सवाद से जोडा वे साम्यवादी विचारधारा के प्रमुख प्रतिनिधि मान जाते थे वे अपने प्रारम्भिक जीवन में मार्क्सवादी नहीं थे एक  कान्तिकारी थे इसलिये इनके प्रारम्भिक जीवन में क्रान्तिकारी कार्य किया जैसे राजनैतिक डकैती करना, कान्तिकारियों को आश्रय देना । कान्तिकारियों को हथियार प्रदान करना इन गतिविधियों के दौरान पुलिस के पीछे पड़ गयी । इसलिये उन्होंने अपना नाम बदलकर अमेरिका चले गये। अमेरिका में वे मार्क्सवादी से प्रभावित हुये 1916 में उन्होंने मार्क्सवाद के लेखो को पढ़ा इसके बाद से ते अधिक प्रभावित हुआ 1918 में  मेक्सिको का साम्यवाद दल का गठन किया। इसी के  प्रतिनिधि के रूप में वह रूस गये जहाँ पर साम्यवादियों के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग  लिया।कम्यूनिस्ट इंटरनेशनल के नाम से जाना जाता है। रूस की क्रांति के बाद रूस के साम्यवादी दल की प्रेरणा से विभिन्न देशों के साम्यवादी दलों के प्रतिनिधि के वार्षिक सम्मेलन में बुलाये जाते थे और इस सम्मेल को कम्यूनिस्ट इंटरनेशनल कहते हैं। यह एक सम्मेल है जो वर्ष में 1 बार होता था इसके द्वितीय सम्मेलन 1920 में समल्लित  हुए। वहाँ पर इनका लेनिन से  सम्पर्क स्थापित हुआ। लेनिग उनसे बहुत प्रभावित हुए। उन्हाने उनको एक लेख लिखने को कहा जिसका शीर्षक  था । On the National and Colonial question जिसको 1922 में उन्हानें एक किताब के रूप में प्रकाशित किया  किया जिसका नाम “Indian In transition राय ने उपनिवेशवाद व औपनिवेशवाद को जोड़ने का प्रयास किया। तथा राष्ट्रीय आन्दोलन  का  विश्लेषण किया। एम. एन रॉय भारत के महान बुद्धिजीवी थे । जिन्होंने   जिले 22 किताबों में 29 लेख लिखे हैं। इसके अतिरिक्त वे  राजनीति में सक्रिय हैं। एक ओर साम्यवादी दल को प्रेरित किया वे 10 वर्ष तक (1930-1940) कांग्रेस में सक्रिय रहे उसके बाद उन्होंने एक दल गठित किया । “Radical Democratic Party”   जब वे रूस में थे तो 60 हन्दुस्तानियों से सम्पर्क स्थापित हुआ इन्हें ‘मुहाजिर कहा जाता था क्योंकि  वे  ये हिन्दुस्तानी थे जो  कि पुलिस से भाग कर रूस में शरण लिए थे। इन हिन्दुस्तानीयों  को  शस्त्र के प्रयोग में प्रशिक्षण दिया उनको दो व  तीन के दशकों में भारत भेजा इसी लोगो ने मिलकर कलकत्ता में 1925 में  भारतीय साम्यवादी दल का गठन किया।

  भारतीय राष्ट्रवादी राय का  मानना था कि भारत में चार प्रमुख वर्ग हैं ।
जमींदारी वर्ग – जो ब्रिटिश शासन का समर्थन करता है।

• बुद्धिजीवी  वर्ग/ व्यापारी वर्ग – ये  ब्रिटिश शासन की उपज है। परन्तु उसके विरोधी हैं। परन्तु इसके विरोध में तो बुद्धिजीवी वर्ग हैं जो  राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। व्यापारी वर्ग अपने हितों को पूर्ति के लिये इनका साथ दे रहे हैं। तथा अन्य दो वर्ग हैं ।

•औद्योगिक श्रमिक वा किसाग वर्ग  –राय का मानना था कि राष्ट्रीय आन्दोलन व्यापारीयों का आन्दोल  है।  इसका उददेश्य पूँजीवाद को समाप्त करना है यह ब्रिटिश व्यापारी तथा भारतीय व्यापारियों के  बीच संघर्ष है। इनके बीच लडाई इसलिये हुयी क्योंकि भारतीय व्यापारी भी व्यापार के माध्यम से मुनाफा कमाना चाहते थे परन्तु हर स्थान पर ब्रिटिश व्यापारीयों को प्राथमिकता दी जाती थी। कानून के द्वारा भी इन व्यापारीयों को ब्रिटिश सरकार से सहायता मिलती थी इसलिये भारतीय ब्रिटिश सरकार को  हटाना चाहती थी इसलिये वे कहते थे कि राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रगति हुयी । क्योंकि ब्रिटिश बुर्जवादी के स्थान पर भारतीय व्यापारी स्थापित हो जायेंगे इससे श्रमिकों को कोई फायदा नहीं होगा सत्ता दो व्यक्तियों के बीच हस्तान्तरित हो जायेंगी इसलिये उन्होंने मांग की छोटे किसान व व्यापारीयों को मिलाकर एक मंच बनाया जाये इनमें एक क्रांतिकारी  के नेतृत्व हो तथा एक क्रान्तिकारी चेतना का प्रचार हो वे राष्ट्रीय आन्दोलनको क्रान्तिकारी बनाये और ब राष्ट्रीय आन्दोलन से भारतीयों के गरीबों व दलितो को देखते है कि फायदा होगा इस प्रकार हम देखते हैं  कि कुछ तत्वों में राय के विचारों  मार्क्स के विचार मिलते हैं तथा कुछ विचारों  में विरोध मिलता है। ये मानववाद को आधार बनाते हैं।

एम.  एन . राय का मानववाद – ये उनकी दो किताबों में पाया जाता है।

• 1947  New humanism

•1947  reasons romanticism and revolution

यह दो खंडों में लिखी गई है इसमें उनका कहना है कि उनका मानववाद नव मानववाद है। क्योंकि उनके पहले के लोगों ने मनुष्य को प्राथमिकता दी है। परंतु मनुष्य के साथ-साथ ईश्वर की सत्ता को स्वीकार किया है । इसलिए उसने मनुष्य को सीमित अति प्राकृतिक सत्ता के अधीन रखा है। राय ने अपने मानववाद मैं अति प्राकृतिक सत्ता को स्वीकार किया है। इसके लिए उन्होंने दो प्रमुख सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है।

•मनुष्य ही  सर्वोच्च मूल्य है ।

•मनुष्य ही समस्त वस्तु का मापदंड है।

पहले सिद्धांत में वे कहते हैं कि मानव जीवन अपने में पूर्ण होता है और इसलिए मनुष्य किसी भी प्रकार की देवी या धार्मिक सत्ता के अधीन नहीं है उन्होंने यह भी कहा था कि कोई भी धार्मिक सत्ता के अधीन नहीं होता है एवं धार्मिक मूल्य नहीं होते हैं। राय का कहना है कि मनुष्य एक नैतिक प्राणी है वह नैतिकता का निर्माण इसलिए करता है कि वह नैतिक व विवेकशील प्राणी है मनुष्य विवेक के आधार पर जिज्ञासु एवं विवेकशील होता है।

राय के राज्य संबंधी विचार – राय ने  समाज में राज्य की  कल्पना नहीं की थी क्योंकि वह कहते थे कि राज्य का समाज उपयोगी संस्थाएं हैं क्योंकि मनुष्य ने पहले समाज का निर्माण किया फिर राज्य का निर्माण किया क्योंकि वह अधिक स्वतंत्रता चाहता था। राज्य को कभी समाप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि राज्य केवल एक साधन है उद्देश्य व्यक्ति की प्रगति व स्वतंत्रता है।

राय और गांधी – राय के द्वारा गांधी की आलोचना के संबंध में उनकी पुस्तक 1922 में इंडिया ट्रांजीशन में मिलता है। यह विचार अधिकांशतः जलियांवाल बाग हत्याकांड के बाद गांधी के असहयोग आंदोलन के संबंध में व्यक्त किए गए थे। जिसे गांधी ने वापस लिया परंतु कांग्रेस में शामिल होने के बाद राय ने अपने विचारों में कोई परिवर्तन नहीं किया गांधी की प्रशंसा दो कारणों से की थी।

•राय का मानना था कि गांधी ने पूंजीवाद की आलोचना की वास्तव में पूंजीवाद ने भारतीय अर्थव्यवस्था का विनाश किया है विशेषकर लघु उद्योग व हस्तशिल्प का विनाश हुआ है यह बात गांधी ने प्रकाश में लाई जो महत्वपूर्ण है।

•गांधी ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नया मोड़ प्रदान किया उनका मानना था कि 1918 तक राष्ट्रीय आंदोलन एक फलत: राजनीतिक आंदोलन बना। जिसका उद्देश्य राजनीतिक स्वतंत्रता थी यह दो अभीजनों के बीच का संघर्ष था भारतीय तथा विदेशी शासक संभवत समझौते की तरफ जा रहे थे परंतु गांधी के द्वारा सबसे पहली बात ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को भी राष्ट्रीय आंदोलन में सम्मिलित किया जाना उत्कृष्ट कार्य था जिसने आंदोलन को सामाजिक आंदोलन बना दिया। 1922 में गांधी की प्रेरणा से कांग्रेस ने एक कंस्ट्रक्टिव प्रोग्राम घोषित किया। इस constructive programme  के चार प्रमुख तत्व थे।

• चरखा अपना

•खादी पहनो

•अस्पृश्यता उन्मूलन

•शराब बंदी 

इनमें से दो प्रस्ताव आर्थिक तथा दो सामाजिक थे राय ने कंस्ट्रक्टिव प्रोग्राम की आलोचना की उनका कहना था कि खादी तथा चरखा की योजना विफल हो जाएगी क्योंकि हर घर में चरखा नहीं चलाया जा सकता दूसरा हर व्यक्ति खादी नहीं पहन सकता हर व्यक्ति खादी इसलिए नहीं पहन सकता क्योंकि मेरे में बने कपड़े की तुलना में खादी महंगा है ।गरीब किसान अपने  तन को ढकने क लिए खादी का प्रयोग नहीं करेगा । जहां तक अस्पृश्यता या शराबबंदी की बात है गांधी की यह बात नेता प्रचार की तरह थी और वह समाज में कोई परिवर्तन लाने के लिए सफल नहीं हुई। समाज में परिवर्तन  के‌ लाने के लिए सबसे पहले एक निरंतर अभियान चलाना पड़ेगा। तथा इसके साथ-साथ उत्पादन साधन में परिवर्तन लाना पड़ेगा तभी सामाजिक स्तर पर परिवर्तन होगा।